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स्त्रियों से उम्मीदें बढ़ गई हैं पर वक्त और प्रकृति की सीमाएं हैं, इसलिए कुंठा बढ़ रही

एक वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर. इंदौर


सेमिनार में आए पार्टिसिपेंट्स।

इमोशनल और सोशल इंटेलिजेंस के बेसिस पर ये हैं चार सॉल्यूशंस

n एक्सपेक्टेशन मैनेज करें : महिलाओं को यह मानना होगा कि आप हर जगह से हर चीज नहीं पा सकतीं। ना ही एक समय में हर चीज कर सकती हैं। डिसाइड करें कि आप करना क्या चाहती हैं। आपकी प्रायोरिटी क्या है।

n टाइम मैनेज करें : काम करने का मतलब सिर्फ काम नहीं है। ट्रेवल, कम्यूटेशन, कम्यूनिकेशन भी इसमें शामिल है। इसमें वक्त लगेगा। इसलिए अपने स्केड्यूल, रूटीन्स और आदतों को यूटिलाइज़ करना आना चाहिए। अपने लिए भी कुछ समय निकालें।

n फिटनेस मैनेज करें : सफलता या प्रॉफिट किस कीमत पर। यह आकलन करना ज़रूरी है। चाहे आप वर्किंग हैं या नहीं, फिजिकल-मेंटल हेल्थ का ध्यान रखना ही होगा।

n इमोशंस मैनेज करें : इमोशनली वीक होने का टैग महिलाओं पर सदियों से लगा हुआ है। इमोशंस आपकी ताकत हैं लेकिन थोड़ी मजबूती रखना भी ज़रूरी है वरना रिलेशनशिप मैनेज करने में दिक्कतें आएंगी।

\\\"अक्सर हम सुनते हैं कि पहले औरतों का संघर्ष ज्यादा था, आज की स्त्री के लिए चीज़ें आसान हो गई हैं, लेकिन असलियत इसके बिलकुल उलट है। आज की महिलाओं पर सायकोलॉजिकल बर्डन ज्यादा है। पहला कारण तो यह पहले जहां महिलाओं से सिर्फ घर और परिवार को उम्मीदें होती थीं, अब वर्कप्लेस पर भी उससे एक्सपेक्टेशंस हैं। समाज को भी उससे उम्मीदें हैं। अब उसे पढ़ना भी है, खुद को साबित भी करना है। थीं। उसे पढ़ाई भी करना है और टॉप भी करना है। काम भी करना है और एक्सीलेंट भी होना है। वो दुनिया को जाने और दुनिया उसे जाने। यह एक्सपोज़र भी उसे चाहिए। इसी के साथ अब उसकी लाइफ में प्लेज़र भी है। वह नए नए अनुभव करना चाहती है। उम्मीदें बढ़ गई हैं लेकिन टाइम और एनर्जी तो
उतनी ही है। इस वजह से एंग्ज़ायटी, फ्रस्ट्रेशन और गिल्ट फेस कर रही हैं आज की महिलाएं।\\\'

इंदौर मैनेजमेंट एसोसिएशन की तरफ से \\\"द न्यू वुमन एंड हर साइकोलॉजिकल चैलेंजेस\\\' विषय पर कराए गए सेमिनार में इमोशनल इंटेलिजेंस एक्सपर्ट डॉ. संदीप अत्रे ने यह चैलेंजेस भी बताए और उनके कुछ सॉल्यूशन भी सुझाए।

उन्होंने कहा - \\\"महिलाओं से उम्मीदें बढ़ गई हैं लेकिन समय, ऊर्जा तो वही है। साथ ही उसका सपोर्ट सिस्टम अब सीमित हो गया है। वो इसलिए क्योंकि यह न्यूक्लियर फैमिलीज़ का दौर है। पहले की तरह घर में 6-7 महिलाएं नहीं होतीं कि जिम्मेदारियां बंट जाएं। वहीं पुरुष आज भी उसी मानसिकता के साथ जी रहे हैं कि घर के काम यानी महिलाओं की जिम्मेदारी।

और तीसरा चैलेंज है बायोलॉजी। युग बदल जाए, सोच बदल जाए, जीने का तरीका भी बदल जाए, लेकिन बायोलॉजी तो वही रहेगी। प्री-मेन्सट्रुअल सिम्टम्स तो वह फेस कर ही रही है। कॅरियर कॉशियस है तो शादी लेट हो रही है। प्रेग्नेंसी में मुश्किल हो रही है। मिस कैरेज बढ़ रहे हैं। कॅरियर के पीक पर वह मैटर्निटी लीव लेने से मुसीबतें बढ़ रही हैं। आज की महिला की लाइफस्टाइल बदल गई है इसलिए उन्हें अपनी बायोलॉजी से भी लड़ना पड़ रहा है।\\\'

चैलेंजेस फॉर न्यू वुमन
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