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नहीं चाहूंगा कि पत्नी मेरे जैसी हो जाएं... ऐसा हुआ तो कितना खराब नाचेंगी: उदयन
रोज एक ही एनर्जी के साथ काम
पर निकलने का सोर्स है प|ी
महिलाओं में जन्मजात क्रिएटिविटी और फैशन सेंस बहुत अच्छा होता है। यह बात मैं बार-बार महसूस करता हूं। मेरी सिर्फ 24 महीने की बेटी अाधी रात को अपनी पसंद के शेड वाले कपड़े पहनने के लिए रो पड़ती है। एक ही कलर के चार शेड्स में अंतर करने और उसमें भी अपनी पसंद चुनने की यह कला लड़कों में इतनी छोटी उम्र में तो नहीं आ सकती। मैं रोज सुबह एक ही जैसी एनर्जी के साथ अगर काम पर निकल पाता हूं, तो उसकी सबसे बड़ी वजह मेरी प|ी है, जो मेरे पीछे घर और बाहर की हर एक चिंता को बिना कोई टेंशन दिए मैनेज करके रखती है। उसने इस जिम्मेदारी को संभालने के लिए अपने प्रोफेशन को छोड़ा और यह कोई छोटी बात नहीं है। -इंडस्ट्रियलिस्ट कुणाल
कराते चैम्पियन ने सुनाई अपनी कहानी
कार्यक्रम में पैरा-ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पूनम श्रीवास्तव ने अपनी कहानी सुनाई। बताया- बड़े भाई पीएचक्यू में जॉब कर रहे थे और उन्होंने ही मुझे मेरी कोच बिट्टू शर्मा मैम से मिलवाया। मैम को उन्होंने पहले ही मेरी ब्लाइंडनेस के बारे में बता रखा था। मैम मुझसे मिलीं और पूछा- कराते सीखोगी? मैंने भी ना जाने क्यों, सिर्फ हां कह दिया। इसके पहले मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं कराते सीखने जा सकती हूं। उन्होंने उसी दिन से मेरी ट्रेनिंग शुरू की। अब तक मैं कई इंटरनेशनल गेम्स में गोल्ड और ब्रॉन्ज अपने नाम कर चुकी हूं।
कथक में तांडव है तो लास्य भी है
अल्पना वाजपेयी ने कथक में इस्तेमाल होने वाली पढ़ंत के उदाहरण देते हुए बताया- कथक में तांडव है, तो लास्य भी है। कृष्ण के बिना राधा संग छेड़छाड़ भी नहीं है और शिव के बिना पार्वती नहीं है। हम अभिनय पक्ष में दोनों को एक साथ निभाते हैं। लेकिन अब खुशी और आनंद में फर्क हो गया है, अब खुश तो हो लेते हैं, लेकिन अनंत आनंद तक पहुंचने के लिए वक्त चाहिए होता है। आप आनंद तक तभी पहुंच सकेंगे, जब संपूर्णता में हों। उन्होंने अलग-अलग भावों के साथ पढ़ंत- कर मुरलिया धर नाच नचावे... सुनाई।
फ्रांस में औरतों को ‘फेमिनिज्म’ के बहाने मजदूरी के लिए लाया गया था घर से बाहर
फेमिनिज्म की शुरुआत फ्रांस से हुई।
यह उस समय शुरू हुआ जब वहां मजदूरों की कमी पड़ गई और मजदूरों के तौर पर महिलाओं को घर से बाहर निकालने की जरूरत थी। लेकिन, सीधे बाहर निकालने के बजाय इसके लिए एक बहाना ढूंढ़ा गया, यह बहाना था ‘फेमिनिज्म’। तब महिलाओं को सशक्त करने के नाम पर उन्हें मजदूरी के लिए फैक्ट्रियों में लगाया गया था। ऑथर एलेन सिजु कहती हैं- फ्रांस दुनिया के बड़े देशों में है, लेकिन भारत में महिलाओं की स्थिति फ्रांस की तुलना में अभी भी बेहतर ही है। आज हम बराबरी की बात करते वक्त स्त्री-पुरुषों के एक जैसा हो जाने की बात करते हैं। महिला और पुरुष, दोनों में अपनी अद्वितीयता है, वे आपस में भी अलग हैं, उनके गुण विशिष्ट हैं। दोनों एक से ही हो जाएं, तो संसार का संतुलन ही नहीं रहेगा। मैं कभी नहीं चाहूंगा कि अल्पना (प|ी) मेरे जैसी हो जाएं, क्योंकि वे बहुत अच्छी नृत्यांगना हैं और मुझ सी हो गईं तो कितना खराब नाचेंगी। तो महिलाओं या पुरुषों को अपनी आईडेंटिटी में एक्सेल करने की ओर आगे बढ़ना चाहिए, ना कि आपस में एक जैसा होने की होड़ में शामिल होना चाहिए। -उदयन वाजपेयी
सिटी रिपोर्टर. भोपाल। स्वामी विवेकानंद लाइब्रेरी और क्लब लिटराटी की ओर से इंटरनेशनल विमंस डे पर ‘बिकमिंग अ विमन\\\' का आयोजन किया गया। इसमें अलग-अलग प्रोफेशन के लोगों ने अपने-अपने ढंग से विमनहुड को परिभाषित किया। इस अवसर पर लेखक उदयन वाजपेयी, इंडस्ट्रियलिस्ट कुणाल, कथक नृत्यांगना अल्पना वाजपेयी, कवि सुहास मिश्रा आदि ने अपनी बात रखी। क्लब लिटराटी प्रेसिडेंट सीमा रायजादा भी मौजूद रहीं।