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आज राजबाड़ा पर गेर नहीं तो इस पोस्टर में देखिए एक झांकी

एक वर्ष पहले
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...91 वर्ष पुरानी मराठी पुस्तक उत्सवादर्श से जुटाए तथ्यों के आधार पर। विश्व विरासत के लिए यूनेस्को को इस किताब के अंश भेजेगा प्रशासन

मुगलेआजम और गाइड जैसी फिल्मों के पोस्टर बना चुके 67 वर्षीय कलाकार ने भास्कर के पाठकों के लिए बनाया पोस्टर, जो दर्शा रहा रंगपंचमी का मूल स्वरूप

739 पन्नों की मराठी पुस्तक उत्सवादर्श
के अनुसार...

पुरुषोत्तम सोलंकी और उनके सहायक कौशल सोनी ने उक्त पोस्टर बनाया। 67 वर्षीय सोलंकी मुगल ए आजम, गाइड से लेकर मेरा नाम जोकर जैसी कई फिल्मों के पोस्टर बना चुके हैं जो सिनेमाघरों में लगाए जाते रहे हैं। वे ब्लॉक तकनीक से ये पोस्टर बनाते थे और अब डिजिटल प्रिंटिंग के दौर में यह विधा खत्म जैसी हो चुकी है।

भगवान का रथ शामिल
**

समय के साथ जैसे-जैसे गेर का रंग बदलता गया, इसमें महिलाएं भी शामिल होने लगीं। हिंद रक्षक संगठन ने नृसिंह बाजार से गेर निकालने की शुरुआत की। इसमें भगवान के रथ को भी शामिल किया। गेर में शामिल पुरुषों के साथ ही महिलाएं भी रथ को खींचकर चलती हंै।

सांस्कृतिक परंपरा की श्रेणी में गेर के लिए करेंगे आवेदन**

सांस्कृतिक, ऐतिहासिक महत्व के स्थल या परंपरा को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल करता है। इंदौर प्रशासन सांस्कृतिक परंपरा के तहत गेर को इसमें शामिल कराने का प्रयास कर रहा है। इस बार गेर नहीं निकल रही है लेकिन प्रशासन यूनेस्को को आवेदन करेगा।

घोड़ों से करवाते थे नृत्य **

1927 में वाटर पंप को पाड़ा गाड़ी से जोड़ रंग उड़ाया जाता था, तभी से गेर की परंपरा शुरू हुई। फिर ऊंट-बग्घी और घोड़े शामिल हुए। गेर में घोड़ों से नृत्य भी करवाया जाता था। बाद में हाथियों को शामिल करने पर रोक लगा दी। वहीं, गेर में ऊंट ने एक व्यक्ति के सिर पर काट लिया था। तबसे ऊंट के मुंह पर जाली बांध शामिल किया जाने लगा।


1957 में निकली शाही गेर**

1957 में संगम कॉर्नर से शाही गेर निकालने का सिलसिला शुरू हुआ। उस वक्त टोरी कॉर्नर, संगम कॉर्नर की गेर आकर्षण का केंद्र बन गई थी। 1973 में आदिवासी नृतकों ने भी गैर में हिस्सा लिया। 1976 में बियाबानी में तो 1979 में मल्हार पल्टन में मॉरल क्लब ने गैर शुरू की। 1992 में श्रमिक क्षेत्र में गेर का रंग चढ़ा।


सोने की पिचकारी से रंगते थे**

हाेलकर काल में रंगपंचमी पर दो दरबार लगते थे। सुबह के दरबार में राज परिवार के लोग और राजदरबारी होते थे। राज परिवार के लिए सोने की चार थाल, नगीने जड़ित सोने की पिचकारी, दरबारी लोगों के लिए चांदी की 70 पिचकारियां, 200 ग्राम केसर घुला रंग, सोने के दो करंडे (हल्दी-कुमकुम के लिए), चांदी की सात तश्तरी रहती थीं।
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