‘वेदों में किसी एक वर्ण का अधिकार’ यह धारण गलत

News - राज्य संग्रहालय में रविवार को दत्तोपंत ठेंगडी शोध संस्थान की ओर से विशेष व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। ठेंगड़ी...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 07:10 AM IST
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राज्य संग्रहालय में रविवार को दत्तोपंत ठेंगडी शोध संस्थान की ओर से विशेष व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। ठेंगड़ी स्मृति शताब्दी पर केंद्रित इस व्याख्यानमाला का विषय भारतीय वांगमय में सर्वसमावेशी सांस्कृतिक चेतना व नित्यबोध रखा गया। इस अवसर पर संस्कृत के विशेषज्ञ और पूर्व कुलपति मिथिला प्रसाद त्रिपाठी बतौर मुख्य वक्ता उपस्थित हुए। इस दौरान उन्होंने कहा कि वेदों में सभी वर्ण के लोगों का वर्णन है, उन्हें सम्मान दिया गया है। वेद सबके लिए हैं। वेद मंत्रों पर सबका अधिकार है। वेदों में सार्वदेशिकता और सर्वसमावेशिकता विद्यमान है। आज के समय में वेदों का अध्ययन जरूरी है। उन्होंने कहा कि वेद के पठन-पाठन पर किसी एक वर्ण का ही अधिकार है, यह धारणा पूर्णतः गलत है। वेद मंत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वेदों में सभी वर्ण के लोगों का उल्लेख मिलता है। विभिन्न प्रकार के काम करने वाले लोगों को सम्मान दिया गया है। उन्हें प्रणाम किया गया है। वेदों में यहां तक कहा गया है कि हमारी प्याऊ और भोजनशाला एक होना चाहिए व हम सभी को मित्र रूप में देखें। आज के समय में वेदों का अध्ययन जरूरी है। हमने वेदों से केवल कर्मकांड ही अपनाया है।

पुराण वेदों के ज्ञान का ही विस्तार है

इस अवसर पर प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि हमारा इतिहास व पुराण वेदों के ज्ञान का ही विस्तार है। हमारे यहां दो तरह की परंपराए बताई गई हैं - वैदिक व लौकिक। लौकिक परंपराओं में जो लोक कथाएं हैं उनमें वेदों का ही ज्ञान विद्यमान है। वाल्मीकि का चिंतन लौकिक है। राम कथा को लौकिक रूप में ही गाया गया है। उन्होंने कहा कि ज्ञान की कोई जाति नहीं होती और न ही कोई गोत्र होता है। ज्ञान भगवान का ही स्वरूप है और इसे हमेशा दूसरों से साझा करना चाहिए।

व्याख्यानमाला आयोजित

सिटी रिपोर्टर . भोपाल

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