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जैन समाज... ईमानदारी, परोपकार से कमाया धन धार्मिक कार्यों में स्वीकार-आचार्य
खंडवा | अनादि काल के संस्कार से जुड़ा हुआ जीव संसार में आते ही साधनों को जुटाने का प्रय| करता है। बचपन में खिलौनों का इकट्ठा करता है, जवानी में धन-संपत्ति जोड़ता है और बुढ़ापे में परिवार व रिश्तेदारों को जोड़कर जिंदगी गुजारता है। सारा जीवन धन, परिवार जोड़ने के कारण व्यक्ति धर्म से नहीं जुड़ पाता। क्योंकि धर्म से जुड़ने के लिए अथक प्रयास करना पड़ता है। यह अवसर सिर्फ मनुष्य पर्याय में ही संभव है। इस पर्याय को पाने वाला ही पाप को गला कर कर्म निर्जरा कर सकता है। यह उद्गार आचार्य डा. प्रणाम सागर जी महाराज ने ग्राम बरूड़ में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा जिसका धन ईमानदारी, परोपकार द्वारा कमाया होता है वहीं धन धार्मिक कार्य में स्वीकार किया जाता है।