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भगवान विट्‌ठल को देना पड़ा अपने भगवान होने का सबूत

एक वर्ष पहले
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भारत भवन की रंगमंडल अतिथि नाट्य प्रस्तुति शृंखला के अंतिम दिन सोमवार को नाटक भये प्रकट कृपाला दीन-दयाला का मंचन किया गया। वर्तमान सम-सामयिक मुद्दों पर केंद्रित इस नाटक का निर्देशन सरोज शर्मा ने किया। नाटक की प्रस्तुति कोशिश थिएटर ग्रुप भोपाल के कलाकारों ने दी। नाटक का परिवेश मूलतः मराठी पृष्ठभूमि रहा। नाटक में दिखाया गया कि 28 युगों से दो ईंटों पर गर्भगृह में खड़ी अभिशप्त विट्ठल भगवान की प्रतिमा एक दिन आरती के दौरान जाग उठती है। भगवान बेसुरे भक्तगणों और पुजारी को चिल्ला-चिल्लाकर रोकते हैं, उन पर टिप्पणियां करते हैं। पर कोई भगवान की आवाज नहीं सुनता। पूजा के दौरान भक्तगण एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए मंदिर में झगड़ते हैं। भक्तों में केवल एक अंधा बूढ़ा है, जिसे भगवान दिखाई पड़ते हैं, पर खुली आंख के अंधेरी आंखों वाले भक्त उस पर विश्वास नहीं करते। भगवान साक्षात प्रकट हो जाते हैं, पर उनके भगवान होने पर अंधे को छोड़कर सब संदेह करते हैं और उनके देवत्व की परीक्षा लेने पर उतारू हो जाते हैं। अपना देवत्व प्रमाणित करने के लिए भगवान अपने अंधे भक्त को आंखें प्रदान करते हैं और पाखण्डी भक्तों के भ्रष्टाचार उजागर करना शुररू करते हैं। तब कहीं जाकर लोग भगवान के भगवान होने पर विश्वास करते हैं। अंत में वे अपने नियत स्थान पर चले जाते हैं।
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