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मानस पटल पर अंकित हैं होली की यादें....**

एक वर्ष पहले
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होली भारतीय संस्कृति का ऐसा त्योहार जो मौसम परिवर्तन की सूचना तो देता ही है जीवन में खुशियों के रंग भर देता है। कितने भी गिले-शिकवे क्यों न हो, होली के माधुर्य रंग में सभी धुल जाते हैं। प्रेम को बढ़ाने वाला जीवन में उल्लास प्रदान करने वाला यह त्योहार अपनी यादें छोड़ जाता है। जीवन की इन्हीं यादों को समटे हुए हैं हमारे जिले के अधिकारी। यादों को कुरेदा है देव कुण्डल ने।**

indore | tuesday 10 march | 2020

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...जब हमारा दोस्त मरते-मरते बचा

आशीष सिंह, आयुक्त, नगर निगम, इंदौर

मेरी प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई लखनऊ में हुई। बचपन में हर साल होली पर इतनी मस्ती करते कि घर वाले परेशान हो जाते थे। हालांकि हम लोग कोई गलत हरकत नहीं करते थे। हां, थोड़ी-बहुत शरारत जरूर करते थे। जब हमारी टोली रंग खेलने निकलती थी तो रास्ते में खाना-पीना भी होता रहता था। एक बार मेरे एक दोस्त ने इतनी भांग पी ली कि उसे कुछ होश ही नहीं रहा। वह चक्कर खाकर गिरने लगा। जैसे-तैसे उसे संभाला और एक जगह बैठाया। दूसरे दोस्त उसके सिर पर बाल्टी भर-भरकर पानी डालते रहे, लेकिन नशा कम नहीं हुआ। दोस्त सिर्फ इतना बोल रहा था कि आज मैं बचूंगा नहीं। आखिरकार हम उसे अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने कहा, इसे सही समय पर ले आए। कुछ देर और हो जाती तो इसकी जान भी जा सकती थी। उसे इंजेक्शन लगाया गया, बॉटल चढ़ाई गई। तीन घंटे बाद वह नॉर्मल हुआ। दोस्त मरते-मरते बचा। इस घटना से हमने सबक लिया कि अब कभी भी खासकर त्योहार पर किसी तरह का नशा नहीं करेंगे। उस घटना के बाद कभी भांग नहीं पी।

10 दिन तक चेहरे से रंग नहीं निकला

नेहा मीणा, सीईओ, जिला पंचायत

होली बचपन से ही मेरा फेवरेट फेस्टिवल है। मैं गुलाबी शहर (जयपुर) से हूं। वहां सबसे ज्यादा होली खेली जाती है। वैसे भी होली राजस्थान का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। बचपन में होली का इतना क्रेज था कि 10 दिन पहले से ही घर में होली का माहौल बन जाता था। चार दिन पहले ही रंग-गुलाल और पिचकारी खरीद लेते थे। एक-एक दिन इंतजार करते थे कि कब होली आए और रंग खेलें। हमारे घर के पास मंदिर से ढोल-ढमाके के साथ रंगोत्सव की शुरुआत होती थी। हमारी नींद ही ढोल की आवाज से खुलती थी। हम भाई-बहन उठते से ही बिस्तर में रंग लगाना शुरू कर देते थे। घर-आंगन से लेकर सड़कें तक रंगीन हो जाती थीं। वैसे हम गुलाल या हल्के रंगों से ही होली खेलते थे लेकिन एक बार किसी ने मुझे चेहरे पर बहुत गहरा कलर लगा दिया था। दिन में चार बार साबुन से चेहरा धोने के बाद भी 10 दिन तक रंग नहीं छूटा। घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। कॉलेज जाते समय रास्ते से लेकर क्लास तक बड़ा अजीब लगा। अब हम हर्बल होली ही खेलते हैं।

टोली ने उठा लिया था, रुपए लेकर ही छोड़ा

संतोष टैगोर, महाप्रबंधक, मप्र पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी

मैं आदिवासी इलाके आलीराजपुर से हूं। वहां की होली मालवा से जुदा है। भगोरिया से होली की जो शुरुआत होती है वह महीनेभर तक चलती है। होली पर गाड़ियों को रोक-रोक कर चंदा मांगा जाता है। बचपन में मैं भी इस खेल का हिस्सा बना था। दोस्तों ने किसी सभ्य व्यक्ति से बदसलूकी कर दी, तो मैंने चंदा गैंग से तौबा कर ली। यहां पुरुषों की टोली महिलाओं का भेष बनाकर चलती है। टोली चेहरे पर भी अजीब-सी चित्रकारी कर लेती, जिसे देखकर ही बच्चे डर जाएं। इस टोली को राय बुड़लिया कहा जाता है। करीब सात दिन तक यह टोली लोगों से जबरिया पैसे वसूलती है। सामने कोई आ जाता है तो उस पर गुस्सा भी करते हैं। जब 14 साल का था, तब राय बुड़लिया टोली ने मुझे उठाकर गाड़ी में बैठा लिया। परिजन द्वारा रुपए देने पर ही मुझे छोड़ा गया। उस वक्त उनकी डिमांड 5 से 10 रुपए होती थी। ढोल की थाप पर रंग खेलने का तरीका भी जबिरया वाला रहता था। मुझे कई बार चोट लगी है।

रंगोत्सव की मस्ती और ठंडाई याद रहेगी

यशवंत कुमार दोहरे, उपायुक्त, मप्र हाउसिंग बोर्ड

बचपन में वैसे तो हर त्योहार बड़े उत्सह से मनाते थे लेकिन होली की मौज-मस्ती कुछ अलग थी। दोस्तों की टोली के साथ सुबह से ही सड़कों पर निकल पड़ते थे। रंग-गुलाल लगाने के साथ, जो आनंद की बारिश शुरू होती थी वह कब उठा-पटक तक पहुंच जाती थी, पता ही नहीं चलता था। कुछ दोस्त ठंडाई के शौकीन थे। एक बार मजाक में बहुत ज्यादा ठंडाई गटक ली। फिर क्या था, सब झूमने लगे। रास्ते में जो मिला उसे रंगीन करते गए। मोहल्ले के एक दादा को रंग लगाने गए तो उन्होंने हमें भजिए के साथ लड्‌डू भी खिलाए। भांग की तरंग में पता ही नहीं चला, कितने लड्‌डू खा गए। हमेें पता नहीं था कि मीठे से सुरूर और तीखा हो जाता है। बाद में जो हुआ वह कभी नहीं भूल सकते। एक दोस्त को पिनक छूटी और कीचड़ में लोटपोट हो गया। उसने हमें भी नहीं बख्शा। इसी दौरान एक बुजुर्ग पर कीचड़ उड़ गया। उनके घरवाले हमसे झगड़ने लगे। मोहल्ले के बड़े-बजुर्गों ने जैसे-तैसे मामला शांत कराया। उस दिन से दोस्तों ने सबक लिया कि अब होली पर भांग नहीं पीएंगे।

लकड़ी लाने में घुटना फूटा, आज भी निशान है

आकाश त्रिपाठी, संभाग आयुक्त, इंदौर

बचपन में होली का काफी क्रेज हुआ करता था। होलिका दहन के लिए हम लोग 15-20 दिन पहले से लकड़ी इकट्‌ठा करना शुरू कर देते थे। कुछ लकड़ियां गीली होती थीं, उन्हें सूखने में वक्त लगता था। हम सभी दोस्त लकड़ी लाने के लिए घरों से दूर सुनसान स्थान या जंगल में जाते थे। लकड़ी काटने का कोई साधन नहीं होता था। एक दोस्त पेड़ पर चढ़कर टहनी में रस्सी बांधता था और बाकी के साथी नीचे से रस्सी खींचकर टहनी तोड़ते थे। एक बार मैं पेड़ से नीचे गिर गया और घुटने में गहरी चोट लगी। काफी खून बहा। 8-10 दिन बाद जब घाव ठीक हुआ तो फिर लकड़ी के लिए पेड़ पर चढ़ गया। इसी दौरान एक सूखी और तीखी टहनी घुटने में वहीं घुस गई जहां चोट लगी थी। पूरा पैर लहूलुहान हो गया। इसके बाद मैं लकड़ी के लिए कभी पेड़ पर नहीं चढ़ा। घुटने में आज भी बचपन की उस चोट का निशान है। एक बार रंग खेलने के दौरान किसी ने हमें किसी ने धोखे से भांग पिला दी। वह इतनी चढ़ गई कि सभी दोस्त काफी देर नाचते-झूमते रहे। खूब मस्ती की और बाद में घंटों सोए। इसके बाद सबक लिया कि अब होली पर कोई पेय पदार्थ का सेवन नहीं करेंगे।

पानी खत्म हो गया, आधी रात को नहा पाए

विवेक शर्मा, एडीजी, इंदौर

प्रदेश में दिवाली से ज्यादा मजे होली पर आते हैं। इसकी वजह यह है कि दिवाली पर लोग अपने-अपने पटाखे फोड़ते हैं लेकिन होली पर ऐसा नहीं होता है। लोग समूह में होली खेलते हैं। मतभेद भूलाकर एक-दूसरे के गले मिल जाते हैं। मेरे पापा सरकारी नौकरी में थे। हम लोग कैंपस में रहते थे। होली पर कैंपस के सब लोग मिलकर खाना बनाने से लेकर पानी भरने तक हर काम खुद करते थे। न हलवाई होता था न कामगार। एक बार हमने देर तक होली खेली। कुछ लोगों ने टोकाटाकी भी की, कि अब बस करो, नहा लो, लेकिन कोई नहीं माना। रंग खेलते-खेलते जब थककर चूर हो गए तो फिर नहाने के लिए होड़ मची। मेरा और कुछ दोस्तों का नंबर सबसे बाद में आया। जब नहाने पहुंचे तो पानी खत्म हो गया। पूरा बदन और कपड़े रंग से सने थे। ऐसे में न तो खाना खाते बने और न सोते। पानी आने का इंतजार करते रहे। रात 12 बजे बाद पानी आया, तब हमने नहाया। यह प्रसंग आज भी यादगार है। जब भी इसकी याद आती है तो लगता है कि वे भी क्या दिन थे। अभाव में भी खुश थे।

सहेली को खिड़की से रंग डालते थे

रुचिवर्द्धन मिश्र, डीआईजी, इंदौर

बचपन की होली की यादें कभी नहीं भुलाई जा सकती। हम तीनों बहन-भाई मोहल्ले के बच्चों के साथ दिनभर होली खेलते थे। उस समय त्योहार का इतना क्रेज हुआ करता था कि पांच दिन तक रंग-गुलाल चलता रहता था। होली के कपड़े भी अलग ही होते थे। परिवार और मोहल्ले की महिलाएं अलग होली खेलती थीं और बच्चे अलग। हर घर में खाने की चीजें (मिठाई, नमकीन इत्यादि) बनती थी। काफी खाने के बाद भी कभी अजीर्ण नहीं होता था। मेरी एक सहेली रंग से काफी डरती थी। हम होली खेलने उसके घर जरूर जाते थे। वह कमरे में छिप जाती और कुंडी नहीं खोलती थी। खिड़की से पिचकारी से उस पर रंग डालते थे। एक बार वह काफी डर गई तो हमने तय किया कि अब कभी किसी को जबरन रंग नहीं लगाएंगे। अब सबकुछ बदल गया है। न होली खेलने का वक्त, न खाने का शौक। बचपन की खुशी अब गंभीरता में तब्दील हो गई है। चूंकि मुझे संगीत का शौक है, इसलिए काम का तनाव और थकान संगीत से कम कर लेती हूं।

घर से दूर उदास था, दोस्तों ने धूम मचा दी

लोकेश कुमार जाटव, कलेक्टर, इंदौर

आठवीं कक्षा तक घर-परिवार में हर साल बड़े जोश और उत्साह से होली खेली। हर साल दोस्तों की टोली मिलकर एक-दूसरे के घर जाते और रंग-गुलाल लगाते थे। नौंवी कक्षा में मेरा एडमिशन सैनिक स्कूल रीवा में हो गया। यह बात 1996 की है। होली पर स्कूल से छुट्‌टी नहीं मिली। जीवन में पहली बार घर से बाहर बिना मम्मी-पापा और बाई-बहन होली पर अकेला था। मन उदास था और घर की होली बहुत याद आ रही थी। सूरज चढ़ने के साथ ही धीरे-धीरे स्कूल परिसर में होली का माहौल बनने लगा। अचानक स्कूल के दोस्त आ धमके और खींचकर मैदान में ले आए। नाचते-कूदते रंग लगाने का सिलसिला शुरू हो गया। दोस्तों के प्रेम ने घर की कमी महसूस नहीं होने दी। हम लोगों ने जमकर होली खेली। मुझे वह होली आज भी याद है, क्योंकि दोस्त क्या होते हैं और दोस्ती का रंग क्या जादू करता है मुझे सैनिक स्कूल में पता चला। आज भी होली के मौके पर यदि पुराने दोस्त मिल जाते हैं तो खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। यूं तो उम्र भर हर पड़ाव पर मित्र बनते हैं लेकिन स्कूल लाइफ की दोस्ती भुलाए नहीं भूल सकते।
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