एसटीएफ जांच के घेरे में अल्पसंख्यक कॉलेज
ये मिली हैं गड़बड़ियां
राज्य शिक्षा केंद्र ने 17 जून 2019 से प्रदेश के 736 डीएलएड कॉलेजों में एडमिशन के लिए ऑनलाइन काउंसिलिंग की प्रक्रिया शुरू की थी। इस प्रक्रिया के तहत 24 सितंबर 2019 तक तीन चरणों में ऑनलाइन काउंसिलिंग कर स्टूडेंट्स के प्रवेश लिए गए थे। काउंसिलिंग की नियमावली के मुताबिक अल्पसंख्यक डीएलएड कॉलेजों की सिर्फ 50 प्रतिशत सीटें ही ऑनलाइन काउंसिलिंग में शामिल की जाती हैं। इससे इन कॉलेजों को अन्य महाविद्यालयों की तुलना में लाभ होता है। इसको देखते हुए ग्वालियर सहित प्रदेश के 100 से अधिक कॉलेजों ने ऑफलाइन सीटें भरने के लिए स्वयं को अल्पसंख्यक कैटेगरी में शामिल करा लिया।
वर्ष 2018 तक तक प्रदेश में सिर्फ 35 अल्पसंख्यक कॉलेज थे, लेकिन 2019 में इनकी संख्या 125 हो गई है। इसी प्रकार ग्वालियर में इनकी संख्या सिर्फ 10 थी, जो बढ़कर 24 हो गई है। इस मामले की शिकायत एसटीएफ से की गई थी, जिसके बाद कॉलेजों की जांच शुरू की गई। शुरूआती जांच में यह तथ्य निकलकर सामने आए हैं कि अल्पसंख्यक बोर्ड द्वारा माइनोरिटी का सर्टिफिकेट जारी होने के बाद नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन (एनसीटीई) द्वारा अप्रूवल दिया जाता है।
इसके बाद इन कॉलेजों को अल्पसंख्यक कैटेगरी में शामिल किया जाता है, लेकिन इन कॉलेजों को सिर्फ आवेदन के आधार पर ही अल्पसंख्यक कैटेगरी में शामिल कर ऑनलाइन काउंसिलिंग से छूट दे दी गई।
नए कॉलेज को ही मिलती है मान्यता
नियम के मुताबिक जो कॉलेज पहले से ही डीएलएड कोर्स का संचालन जनरल कैटेगरी के हिसाब से कर रहा है, उसे बाद में अल्पसंख्यक कॉलेज की मान्यता नहीं दी जा सकती है। इसके लिए सोसायटी को मंत्रालय से मान्यता दिलाने के बाद नया कॉलेज खोलना पड़ता है। उसी के बाद ही उसे अल्पसंख्यक के तौर पर मान्य किया जा सकता है। अल्पसंख्यक कैटेगरी में वही कॉलेज शामिल होते हैं, जिनकी सोसायटी अल्पसंख्यक कैटेगरी के नाम पर बनाई जाती है और उसमें उसी समाज के लोग पदाधिकारी व सदस्य होते हैं। उदाहरण के तौर पर ग्वालियर में जैन व पंजाबी समाज की सोसायटी के आधार पर अल्पसंख्यक कॉलेज का दर्जा दिया गया है।
पूरी सीटें भरी ऑफलाइन
इन कॉलेज संचालकों ने सत्र 2019-20 की मान्यता लेने के बाद जानबूझकर 50 प्रतिशत सीटें ऑनलाइन नहीं भरीं। इसका कारण यह था कि ऑनलाइन एडमिशन के दौरान 35 हजार रुपए की फीस जमा होती है, जबकि कॉलेज संचालक 60 से 80 हजार रुपए में ऑफलाइन एडमिशन लेते हैं। सीटें खाली रखकर बाद में कॉलेज संचालकों ने राज्य शिक्षा केंद्र से स्पेशल परमिशन मांगकर 100 फीसदी सीटें ऑफलाइन भर लीं। ग्वालियर में सिर्फ एक कॉलेज ने 30 सीटों पर ऑनलाइन एडमिशन लिए थे।
मान्यता को लेकर गड़बड़ियां सामने आई
डीएड के अल्पसंख्यक कॉलेजों की मान्यता को लेकर शिकायत आई थी, जिसकी जांच अभी चल रही है। प्राथमिक जांच में कुछ गड़बड़ियां निकलकर सामने आई हैं। हमने इस संबंध में एनसीटीई और राज्य शिक्षा केंद्र से भी दस्तावेज मांगे हैं। इसके बाद इन दस्तावेजों का सत्यापन कराया जाएगा, क्योंकि जिले में अचानक से माइनोरिटी कॉलेजों की संख्या बढ़ी है।
चेतन सिंह, टीआई एवं इंवेस्टीगेशन ऑफिसर, एसटीएफ
}अधिकतर कॉलेजों में दिखावे के लिए सिर्फ अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को पदाधिकारी के तौर पर शामिल किया गया है, लेकिन ये लोग मिल नहीं रहे हैं।
} अल्पसंख्यक की सूची में शामिल कई कॉलेज सिर्फ कागजों में ही चल रहे हैं। न तो इनकी बिल्डिंग है और न ही फैकल्टी।
}एनसीटीई से भी जानकारी मांगी गई है कि किस नियम पर दस्तावेज के आधार पर इन्हें अल्पसंख्यक घोषित
किया गया है।
सामान्य से अल्पसंख्यक कैटेगरी में पहुंचे 10 से अधिक डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (डीएड) कॉलेज अब स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की जांच के दायरे में आ गए हैं। डीएड काउंसिलिंग के दौरान 50 प्रतिशत सीटें काउंसिलिंग से मुक्त कराने के लिए कॉलेज संचालकों ने सेटिंग के जरिए अल्पसंख्यक कैटेगरी में रजिस्ट्रेशन करा लिया था। अब जांच के दौरान इन कॉलेजों के खिलाफ साक्ष्य भी मिले हैं कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर इन्होंने मान्यता हासिल की है।
फर्जी दस्तावेजों पर एनसीटीई व राज्य शिक्षा केंद्र से मान्यता लेने का खुलासा
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फैक्ट फाइल
736
डीएलएड कॉलेज हैं मध्यप्रदेश में
125
को दी अल्पसंख्यक कॉलेज की मान्यता
24
अल्पसंख्यक कॉलेज बनाए हैं जिले में
28000
से अधिक सीटें हैं डीएड के लिए