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लखनऊ में काम का मौका छोड़ नज़ीर अकबराबादी ने चुना आगरा

एक वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर . भोपाल

दुनियां में बादशाह है, सो है वह भी आदमी, और मुफ्लिसों गदा है सो है वह भी आदमी, जरदार बेनवा है, सो है वह भी आदमी, नैमत जो खा रहा है, सो है वह भी आदमी...। ऐसी ही कविताओं के साथ शुक्रवार को रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन में नाटक आदमी नामा खेला गया। इस नाटक का निर्देशन युवा रंगकर्मी अभिजीत सोलंकी ने किया। इसका निर्देशन रिजवान उल हक ने किया है।

नाटक में आदमी नामा कविता का इस्तेमाल किया गया। जिसमें कविता थी- अब्दाल, कुतुबी, गौस, वली आदमी हुए, मुन्किर भी आदमी हुए और कुफ्र के भरे, क्या-क्या करिश्मे, कश्फो करामात के किए...। यह नाटक नजीर अकबराबादी पर केंद्रित है, जिसमें बताया गया कि नजीर के पास लखनऊ से काम का न्यौता आता है, लेकिन वे आगरा में रहकर काम करना चुनते हैं। अंत में जब नजीर का देहांत होता है, तो हिंदु और सिया-सुन्नी नजीर पर अपना हक जताते हैं।

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