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होली पर मंदिर में अपने इष्टदेव को चढ़ाएं गुलाल, घर के वरिष्ठ लोगों का लें आशीर्वाद
कपूर डालने से वातावरण होगा पवित्र
होलिका दहन संबंधित कई परंपराएं प्रचलित हैं। होलिका के पास दीपक जलाने और परिक्रमा करने की परंपरा का पालन अधिकतर लोग करते हैं। होलिका दहन से पहले होली में अनाज डाला जाता है। होली के समय खेतों में नया अनाज पक जाता है। पुराने समय में फसल पकने की खुशी में ही होली की रात आग जलाकर उत्सव मनाया जाता है। होली की रात होलिका के पास और किसी मंदिर में दीपक जलाएं। होली दहन के समय परिवार के सभी सदस्यों को होलिका की तीन या सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करते समय होलिका में चना, मटर, गेहूं, अलसी डालना चाहिए। होलिका में कपूर भी डालना चाहिए। इससे होली जलते समय कर्पूर का धुआं वातावरण की पवित्रता बढ़ाता है। होली के दिन सुबह रंग खेलने के बाद शाम के वक्त मंदिर में अपने इष्टदेव को गुलाल चढ़ाएं, घर के वरिष्ठ लोगों का आशीर्वाद लें।
होली पर गुरु धनु में और शनि मकर में
इस वर्ष गुरु और शनि का एक दुर्लभ संयोग बन रहा है। ये संयोग 499 साल के बाद बना है। होली पर ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में रहेंगे। 9 मार्च को गुरु अपनी धनु राशि में और शनि भी अपनी ही राशि मकर में रहेगा। इससे पहले इन दोनों ग्रहों का ऐसा योग 3 मार्च 1521 को बना था, तब भी ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में ही थे। ग्रहों के इस योग में होली आने से ये शुभ फल देने वाली रहेगी। हर साल जब सूर्य कुंभ राशि में और चंद्र सिंह राशि में होता है, तब होली मनाई जाती है।
करें विष्णुजी का पूजन
मुख्य रूप से होली पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। प्राचीन में फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर प्रहलाद का जीवन विष्णु भक्ति की वजह से ही बचा था। तभी से हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन के साथ ही विष्णु पूजन करने की परंपरा प्रचलित है। विष्णुजी के साथ ही महालक्ष्मीजी की प्रतिमा भी रखें। भगवान का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करें। पीले चमकीले वस्त्र चढ़ाएं। मिठाई का भोग लगाएं और ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें।
हो ली में जितना महत्व रंगों का है उतना ही महत्व होलिका दहन का भी है। रंग वाली होली से एक दिन पहले होली जलाई जाती है, जिसे होलिका दहन कहते हैं। होलिका दहन की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है। सूखी टहनियां, लकड़ी और सूखे पत्ते इकट्ठा कर उन्हें एक सार्वजनिक और खुले स्थान पर रखा जाता है। फिर फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को अग्नि जलाई जाती है। होलिका दहन के साथ ही बुराइयों को भी अग्नि में जलाकर खत्म करने की कामना की जाती है। इस बार 9 मार्च की रात होलिका दहन किया जाएगा और 10 मार्च को सुबह होली खेली जाएगी।
9 मार्च की रात होलिका दहन और 10 मार्च को खेला जाएगा रंग
Expert**
पं. मनीष शर्मा, ज्योतिषाचार्य, उज्जैन
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