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प्रेमचंद की रसिक संपादक आज भी प्रासंगिक- महिलाओं के टैलेंट नहीं, सौंदर्य को तवज्जो

एक वर्ष पहले
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सामाजिक संदेश

चोखेलाल की रस मिजाजी

कहानी में दिखाया गया कि नव रस पत्रिका के संपादक चोखेलाल रस मिजाजी है। पत्रिका में प्रकाशन के लिए चयनित की जानी वाली कविताओं का मानक- गुणवत्ता, योग्यता के बजाय उसे लिखने वाली स्त्री का सौंदर्य बन गया था। सुंदर स्त्रियों की कविताओं को ज्यादा तवज्जो मिल रही थी। कामाक्षी नामक युवती संपादक को उत्तेजक कविताएं भेजने लगी तो उसने सोचा कि कविता की तरह ही स्त्री के भाव होंगे। लेकिन स्त्री की प्राथमिकता सिर्फ कविताएं ही थीं। अंत में चोखेलाल जब लड़की से मिलते है तो वो उतनी खूबसूरत नहीं होती, जितनी उनकी अपेक्षा थी, इसी के साथ नाटक का अंत होता है।

रवींद्र भवन में आयोजित अर्जुन सिंह रंगोत्सव के तहत शनिवार को नाटक ‘रसिक संपादक’ का मंचन किया गया। वीणा शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक की प्रस्तुति दिल्ली के रंग विशारद थिएटर ग्रुप के कलाकारों ने दी। स्वार्थपूर्ण प्रेम और स्त्री सौंदर्य के चित्रण के साथ शुरू हुए नाटक में कलाकारों ने अपने उम्दा अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया। कहानी में शारीरिक सौंदर्य के पीछे भागने के चारित्रिक पतन को प्रदर्शित किया गया। 21वीं सदी में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बावजूद महिलाओं के प्रति विशेष मानसिकता को दर्शाया गया है। यह नाटक का 37वां शो था।

आज भी है प्रासंगिक

मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखे गए नाटक में यह दिखाया गया कि इस सदी में भी महिलाओं के प्रति लोगों की सोच में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। आज भी लोगों की सोच वैसी ही है। सुंदर स्त्रियों की कविताओं को ज्यादा तवज्जों मिल रही थी। अंत में दर्शकों को मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश भी मिला।

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