निजी अस्पतालों ने बंद किया मरीजों का इलाज

News - इंदौर

Jan 16, 2020, 07:56 AM IST
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इंदौर
केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाले इंदौर के पांच हजार से ज्यादा कर्मचारियों को सीजीएचएस के अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इन कर्मचारियों का इलाज सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम यानी सीजीएचएस के तहत होता है। इसकी एक डिस्पेंसरी इंदौर में भी है। यहां की ओपीडी से गंभीर बीमारियों के मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों में रैफर किया जाता है। इसके लिए इंदौर में पांच निजी अस्पतालों से टाई-अप किया गया था। करीब आठ माह से इन अस्पतालों ने सीजीएचएस से आने वाले मरीजों का कैशलेस इलाज बंद कर दिया है। कारण यह है कि अस्पतालों को दो करोड़ से अधिक का भुगतान नहीं किया गया है।

इस वजह से कैंसर, हार्ट अटैक, शुगर और किडनी की समस्याओं से जूझ रहे मरीजों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ रहा है। डायलिसिस और कीमोथैरेपी कराने वाले मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी है। अस्पतालों का कहना है कि मरीजों को इलाज कराना है तो वे सीजीएचएस रेट पर हमें भुगतान कर दें। फिर वे अपनी राशि क्लेम कर रीइंबर्स करा लें, जबकि स्कीम के तहत मरीजों को सिर्फ कैशलेस इलाज की सुविधा ही दी जाती है। इसका भुगतान लेने के लिए अस्पतालों को ही क्लेम करना होता है।

इंदौर की डिस्पेंसरी भोपाल के अधीन, इसलिए ज्यादा दिक्कत

करीब तीन साल पहले ही इंदौर में सीजीएचएस डिस्पेंसरी खुली है। यह भोपाल के अधीन है। इस कारण ज्यादा दिक्कत हो रही है। दरअसल भोपाल में इस स्कीम के तहत दस अस्पतालों से टाई-अप किया गया है। केंद्र सरकार जो फंड देती है, उससे पहले इन अस्पतालों का भुगतान किया जाता है। उसके बाद इंदौर का नंबर आता है। इंदौर में स्कीम के तहत पांच निजी अस्पतालों से टाई-अप है। इनमें से चार अस्पतालों में सिर्फ आंखों का इलाज किया जाता है। मात्र एक अस्पताल ही ऐसा है, जहां सभी तरह की बीमारियों का इलाज होता है। इसलिए इस अस्पताल का बिल करोड़ों में बनता है। फिलहाल इस अस्पताल का दो करोड़ रुपए का भुगतान अटका हुआ है। इस वजह से अस्पताल प्रबंधन ने मरीजों का कैशलेस इलाज बंद कर दिया है।

पांच हजार लोगों के लिए सिर्फ दो डॉक्टर

इंदौर में केंद्र सरकार के कार्यरत और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की संख्या पांच हजार से अधिक है। इन्हें चिकित्सकीय सुविधा देने के लिए सीजीएचएस की डिस्पेंसरी खोली गई है। इसमें मात्र 2 डॉक्टर हैं, जो ओपीडी के साथ ही मरीजों का रैफरल भी देखते हैं। डिस्पेंसरी भोपाल के अधीन है। यहां के वित्तीय या अन्य मामलों पर फैसले भोपाल के अधिकारी ही लेते हैं। इससे निजी अस्पतालों के भुगतान की प्रक्रिया लंबी हो गई है। इंदौर के स्टाफ ने आंखों के इलाज के लिए चार अस्पतालों से टाई-अप किया है, जबकि अन्य बीमारियों के लिए एक ही अस्पताल को जोड़ा है। अन्य अस्पतालों को स्कीम से जुड़ने के लिए प्रपोजल तक नहीं भेजा गया।

खर्च करना पड़ते हैं ज्यादा रुपए

 पिताजी की दोनों किडनी खराब हो गई हैं। इंदौर में समय पर भुगतान नहीं मिलने के कारण निजी अस्पतालों ने कैशलेस इलाज बंद कर दिया है। मजबूरन हमें ज्यादा रुपए खर्च कर डायलिसिस कराना पड़ रहा है।

विनोद सिंह, पीड़ित

कीमो थैरेपी के लिए होते हैं परेशान

 पति केंद्र सरकार के सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, लेकिन उन्हें इलाज के लिए सीजीएचएस की सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है। यहां डिस्पेंसरी से रैफरल तो मिल जाता है, लेकिन जिन अस्पतालों से टाई-अप है वह इलाज करने से मना कर देते हैं। हमें छह माह से कीमोथैरेपी के लिए भोपाल के अस्पतालों में जाना पड़ रहा है।

राधिका चटर्जी, पीड़ित

डिस्पेंसरी स्टाफ को निर्णय का अधिकार ही नहीं

 सीजीएचएस डिस्पेंसरी में महज दो डॉक्टरों की नियुक्ति की गई है। यहां के स्टाफ को निर्णय लेने का अधिकार ही नहीं है। इसलिए कई बड़े अस्पतालों को स्कीम के तहत इलाज करने के लिए अनुबंधित नहीं किया जा सकता है। इस मामले में हम लगातार केंद्र सरकार को शिकायत कर रहे हैं, लेकिन ध्यान नहीं दिया गया है।

मुकेश चौहान, कन्वेयर पेंशनर्स एसोसिएशन

कोशिश कर रहे हैं कि इलाज शुरू हो जाए

 यह सही है कि सीजीएचएस के तहत आने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों में इलाज नहीं मिल पा रहा है। लंबे समय से भुगतान नहीं होने से यह स्थिति बनी है। हमने 55 लाख रुपए का भुगतान कर दिया है। शेष राशि भी जल्द रिलीज कराने की कोशिश कर रहे हैं। मरीजों को बेहतर इलाज मिले इसलिए हर स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. रमाशंकर रावत, इंचार्ज सीजीएचएस डिस्पेंसरी

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