युवाओं को पसंद आए इसलिए फिल्मी धुनों पर होने लगी कव्वाली लेकिन अदब अब भी कायम

Badwani News - भास्कर संवाददाता | जुलवानिया हजरत अब्दुल करीम बाबा की दरगाह पर चार दिनी उर्स के आखिरी दिन सोमवार रात में...

Dec 04, 2019, 09:15 AM IST
Julwaniya News - mp news qawwali started happening on film tunes so that the youth liked it but the glory still remained
भास्कर संवाददाता | जुलवानिया

हजरत अब्दुल करीम बाबा की दरगाह पर चार दिनी उर्स के आखिरी दिन सोमवार रात में सूफियाना कव्वाली प्रोग्राम में आना मेरे लिए बेहद खुशकिस्मती की बात है। यूपी में कानपुर और लखनऊ में कव्वाली खूब सुनी जाती है लेकिन जुलवानिया के श्रोता और करीम बाबा के मुरीदों की बात भी निराली है। बाबा की दरगाह पर सूफियाना कव्वाली के दौरान ऐसा लगा कि हमारी रूह भी उनसे जुड़ गई है। सूफी संतों की तारीफ में सूफीयाना कव्वाली होती है। ये जवाबी कव्वाली से अलग है। यहां श्रोताओं में बड़ी तादाद में युवाओं और बच्चों को देखकर लगा कि कव्वाली का क्रेज कभी खत्म नहीं हो सकता है।

युवाओं को कव्वाली पसंद आए इसलिए इसे नए गानों की धुन पर पेश किया जाने लगा है। सोशल मीडिया और यूट्यूब के इस जमाने में कई कव्वालियां अवाम की फरमाइश पर पेश करनी पड़ती हैं। कव्वाली के दौरान सिर पर टोपियां, साफा बांधना यह अदब है, संस्कार है, पिछले 24 सालों से कव्वाली पेश कर रहा हूं। 100 से अधिक प्रोग्राम किए हैं। कव्वाली में नए फिल्मों गीतों की धुन पर बदलााव देखे हैं लेकिन अदब हमेशा कायम रही। फूहड़ता नहीं आई।

शेर : मेरे अल्लाह ये आरजू है मेरी, काश मेरे दिल का अरमान हो, आदमी आदमी से मोहब्बत करे, चाहे हिंदू हो चाहे मुसलमान हो।- कव्वाल दानिश मोनिस

दानिश मोनिस कव्वाली सुनाते हुए।

कव्वाली के शेर सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि निचोड़ होते हैं

जुनैदा सुल्तानी के साथ आए कव्वाल दानिश मोनिस ने बताया कि बुजुर्गों के साथ युवा भी कव्वाली सुनने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं। इसलिए कव्वाली के दौरान शेर सुनाकर उन्हें कव्वाली की ओर आकर्षित किया जाता है लेकिन कव्वाली के शेर सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं हैं बल्कि कव्वाली के विषय का निचोड़ होते हैं। सोशल मीडिया यूट्यूब के माध्यम से अनेक फनकारों की कव्वाली युवा सुनते हैं। मुकाबला कव्वाली को मनोरंजन के तौर पर लोग सुनते हैं। लेकिन सूफियाना कव्वाली को सभी लोग पसंद करते हैं। हर फनकार अपनी कव्वाली खुद लिखता है, लेकिन जब अवाम के लोगों की फरमाइश होती है तो यूट्यूब और नए गानों की तर्ज पर अपने कलामों को पेश करता है। कव्वाल शेरवानी, जैकेट वाला कुर्ता-पैजामा, टोपी साफा और रुमाल पहनकर ही कव्वाली पेश करते हैं। यह अदब का मामला है। उस्ताद कव्वाल अहमद खान से कव्वाली सीखी है। 14 सालों से कव्वाली कर रहे हैं। 60 से अधिक कव्वाली के प्रोग्राम कर चुके हैं।

हम यह न देखें कि हिंदू मुसलमान कौन है, इसका पता लगाओ इंसान कौन है, मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में मत उलझे रहो, घर-घर जाकर पता लगाओ परेशान कौन हैं।- कव्वाल जुनैद सुल्तानी

देर रात तक चला कव्वाली प्रोग्राम

हजरत अब्दुल करीम बाबा का 44वां उर्स मुबारक का रंगे महफिल के साथ समापन हुआ। प्रदेश के गृहमंत्री बाला बच्चन ने सपरिवार दरगाह पर चादर व फूल पेश किए। दशहरा मैदान पर रात 10.30 बजे से कव्वाली प्रोग्राम शुरू हुआ जो देर रात तक चला। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद रहे।

दानिश ने किया प्रोग्राम का आगाज

प्रोग्राम का आगाज प्रसिद्ध कव्वाल दानिश मोनिस ने आयो रे, आयो मोरे अंगना अब्दुलकरीम आयो रे कव्वाली सुनाकर किया। कव्वाल जुनैद सुल्तानी ने मेरे अल्लाह मेरी सांसों की हिफाजत करना, मेरे बच्चे अभी चलना भी नहीं सीखे हैं। मरने के बाद तो सबको अल्लाह की तरफ लौट जाना है, खुशकिस्मत होते हैं लोग जो जिंदा ही अपने रब की तरफ लौट जाते हैं सुनाकर खूब दाद बटोरी।

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