रनु बाई बांझ स्त्री की कोख बहोर कर देती हैं एक पुत्री

News - चैत्र वदी 10 से चैत्र सुदी तीज तक 9 दिनों में गणगौर का उत्सव निमाड़ में मनाया जाता है। इस दाैरान शिव-पार्वती,...

Mar 27, 2020, 07:46 AM IST
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चैत्र वदी 10 से चैत्र सुदी तीज तक 9 दिनों में गणगौर का उत्सव निमाड़ में मनाया जाता है। इस दाैरान शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सावित्री, विष्णु-लक्ष्मी तथा चंद्रा-रोहिणी की वंदना के गीत गाए जाते हैं। इनमें सबसे अधिक गीत रनु देवी और उनके पति (धनियर) सूर्य के संवाद के रूप में कहे गए हैं। रनुबाई ही निमाड़ी लोक गीतों की अधिष्ठात्री देवी है।

निमाड़ गणगाैर एवं लाेक कला मंडल की कलाकार साधना हेमंत उपाध्याय ने बताया कि इसके एक गीत में सौराष्ट्र देश से आने का संकेत रेणु देवी की पहचान के लिए महत्वपूर्ण है। एक गीत में रनुबाई काे रानी कहा गया है। इसमें रनु बाई के मंदिर का वर्णन है। आसन पर रनु बाई विराजती है और अपने भक्तों के लिए मंदिर का द्वार खोल देती है। एक अन्य गीत में कहा गया है कि रनु बाई बांझ स्त्री की कोख बहोर कर एक पुत्री देती है।

उन्हाेंने बताया कि स्व.पद्मश्री राम नारायण उपाध्याय द्वारा लिखी गई पुस्तक निमाड़ का सांस्कृतिक इतिहास के अनुसार रनु देवी सूर्य देव की प|ी राज्ञी का ही अपभ्रंश भाषा और लोक भाषा में घिसा हुआ रूप है। राज्ञी देवी की पूजा गुजरात सौराष्ट्र में प्रचलित थी। उसकी 14वीं शती तक मूर्तियां पाई गई हैं। एक मूर्ति के लेख में उसे श्री सांबादित्य की देवी श्री राना देवी कहा गया है। सौराष्ट्र में पोरबंदर के समीप बगवदर अाैर किंदर खेड़ा में रना देवी या रांदल देवी के मंदिर है। मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण, विष्णु धमोत्तर पुराण आदि के अनुसार राज्ञी और निक्षुभा सूर्य की स्त्रियां थीं। वस्तुतः यह राज्ञी देवी गुप्त काल से पहले ईरानी शकों के साथ गुजरात सौराष्ट्र में लाई गई पहलवी भाषा में इसका नाम रखा रश्न था जाे मिश्र या मिहिर की सहयाेगिनी थी। जैसे यज्ञ अाैर रशन वैसे ही राज्ञ या रश्त एक-दूसरे से संबंधित रूप है। जैसा कि निमाड़ी लाेक-गीत में कहा गया है गुजरात-साैराष्ट्र में भी राणादे या रांदल मां की पूजा संतान प्राप्ति के लिए की जाती है। अर्वाचीन गुजराती में भी राणादे के भजन पाए जाते हैं।

नारी जीवन का गीत-काव्य है गणगाैर उत्सव -उपाध्याय

श्रीमती उपाध्याय ने बताया गणगाैर के त्यौहार को एक तरह से नारी जीवन का गीत-काव्य है। चैत्र वदी दसमीं से चैत्र सुदी तृतीया तक 9 दिनों इस त्यौहार में हर काम गीत गाकर ही किए जाते हैं। महिलाअाें द्वारा सामूहिक रूप से जब इस त्यौहार को मनाया जाता है तो कुछ ऐसे लगता है मानो ऋतुराज वसंत की अगवानी की जा रही हो। हमारे राज्य में कोयल की कूक, पलाश के फूलों की लाली और होली की उतरती खुमारी के साथ जब यह त्यौहार शुरू होता है तो गीतों की गूंज से सारा गांव सराबोर होता है। इसमें होली की राख से चुने गए गीतों के स्वर के साथ गाैरी की प्रतिष्ठा कर छोटी-छोटी टोकनी मिट्टी गेहूं की फसल की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है और फिर उसे प्रतिदिन से हुए नित्य आरती और उसकी उपासना की जाती है और गाया जाता है।

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