हिंदी पढ़ने से बच्चों का गणित सुधरता है, निर्णय और तर्क क्षमता भी बेहतर होती है

Bhaskar News Network

Sep 14, 2019, 06:56 AM IST
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अमेरिकी डॉक्टर्स में तीसरी सबसे समझी जाने वाली भाषा है हिंदी


पहले ब्रिटिश व्यापारी ने जहांगीर से हिंदी में बात की थी


केरल के पल्लीपुरम गांव में पंचायत ने ही सभी के लिए हिंदी सीखना अनिवार्य किया

बाबू के पीटर | कोच्चि

किसी दूसरे प्रदेश या देश जाकर वहां की भाषा सीखना आम बात है। लेकिन केरल में ऐसा नहीं है। यहां के मलयाली भाषी उत्तर प्रदेश या बिहार से आने वाले मजदूरों से हिंदी सीख रहे हैं। सूबे की पल्लीपुरम ग्राम पंचायत में सभी के लिए हिंदी सीखना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के साथ एक अभियान चलाया जा रहा है। पंचायत के क्षेत्राधिकार में रहने वाले सभी परिवार हिंदी बोलना सीख रहे हैं। ऐसा इसलिए ताकि दूसरे प्रदेशों से आने वाले मजदूरों से बातचीत सहजता से की जा सके। पंचायत वयस्कों को 52 हफ्तों का प्रशिक्षण दे रही है।

बच्चों के लिए हिंदी का प्रशिक्षण नि:शुल्क है। पल्लीपुरम पंचायत के अध्यक्ष पीआर हरिकुट्टन बताते हैं, ‘आवेदक को प्रशिक्षण के तहत 52 कक्षाएं लेनी होती हैं। एक परीक्षा भी हाेती है, जिसके बाद प्रमाण पत्र मिलता है।’ वे कहते हैं, ‘60 लोगों का पहला समूह पास हो चुका है। ये सभी अब अपने पड़ोसियों और नजदीकी पंचायत के लोगों को प्रशिक्षण देंगे। इस तरह आसपास की सभी पंचायतें और रहने वाला हरेक स्त्री-पुरुष हिंदी सीख लेगा। हमारी कोशिश है कि पल्लीपुरम के 17 वार्डों में रहने वाले 7850 परिवारों के करीब 20 हजार लोग अगले दो साल में हिंदी में बात करने लगें।’

हिंदी के प्रति इस लगाव के पीछे वजह भी है। दरअसल, पल्लीपुरम पंचायत अलपुझा जिले का औद्योगिक केंद्र है। यहां सूचना-प्राैद्योगिक केंद्र और केरल राज्य औद्योगिक विकास निगम का प्रशिक्षण केंद्र है। नए उद्योग भी यहां पहुंच रहे हैं। अभी यहां करीब 1000 उत्तर भारतीय मजदूर हैं और जल्द ही संख्या बढ़ेगी। कोच्चि के प्रवास और समग्र विकास केंद्र के कार्यकारी निदेशक बेनॉय पीटर कहते हैं, ‘इस पहल से स्थानीय लोगों से संवाद बेहतर होगा।’ राज्य सरकार के आंकड़े देखें तो केरल में 2018 में तकरीबन 35 लाख बाहरी मजदूर काम कर रहे हैं। इनमें हिंदी भाषी भी शामिल हैं।

3 हजार साल में अंग्रेजी सहित 6 भाषाएं रही हैं वैश्विक शक्ति

दुनिया में भारत का असर बढ़ रहा है, इसलिए हिंदी भाषा का भी हो रहा है विस्तार

रितेश शुक्ला | भोपाल

कौन किस भाषा में बोलता और लिखता है, यह मोटे तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति का जन्म कहां हुआ है। दूसरी ओर, मातृभाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा को सीखने की आवश्यकता इस बात पर निर्भर है कि किस देश का प्रभुत्व दुनिया में ज्यादा है। जिस देश का प्रभुत्व होगा वहां की भाषा भी दुनिया सीखेगी। इतिहास और वर्तमान इस बात के साक्षी हैं कि शक्तिशाली लोगों की मातृभाषा विश्व स्तर पर सीखी, बोली और लिखी जाएगी और लिंग्वा फ्रांका बनेगी। लिंग्वा फ्रांका का अर्थ है- इस्तेमाल में ली जाने वाली वो सबसे प्रभावशाली भाषा, जो इस्तेमाल करने वालों की मातृभाषा न हो। इस पैमाने पर देखें तो बीते तीन हजार साल में ग्रीक, लैटिन, पॉर्च्युगीज, स्पैनिश, फ्रेंच और अंग्रेजी अलग-अलग दौर में प्रभावशाली रही हैं। 18वीं सदी के मध्य में फ्रांस के विद्वान वॉल्टेयर ने ‘फिलॉसफी ऑफ हिस्ट्री’ लिखी। इसका विषय संपूर्ण मानव जाति का इतिहास था। अध्ययन में यह तथ्य निकलकर आया कि ईसा पूर्व नौवीं सदी से लेकर चौथी सदी तक यूरोप शहर रूपी कई साम्राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से एथेंस व्यापार और सैन्य ताकत बनकर उभरा। इसलिए प्रभावशाली एथेंस की ग्रीक भाषा यूरोप की लिंग्वा फ्रांका बनी। इसी दौरान रोमन साम्राज्य उभरने लगा और ईसा पूर्व 201 से आने वाले 600 वर्षों तक यूरोप का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बना रहा। लिहाजा कैथोलिक चर्च की ताकत बढ़ी और रोमन भाषा लैटिन लिंग्वा फ्रांका बन गई। चौथी सदी में रोमन साम्राज्य दो हिस्सों में बंट गया। इसके बाद यूरोप अंधेरे युग में प्रवेश कर गया। लेकिन लैटिन लिंग्वा फ्रांका बनी रही क्योंकि आने वाले एक हजार साल तक कोई नई वैश्विक शक्ति नहीं उभरी। 1492 में कोलंबस ने अमेरिका की खोज की और छह वर्ष बाद वास्कोडिगामा ने भारत में कदम रखा। ये दोनों यात्राएं पुर्तगाल के खर्चे पर हुई और इस तरह से पुर्तगाल साम्राज्य शक्तिशाली होने लगा। पुर्तगाल की देखा-देखी स्पेन और फ्रांस भी उपनिवेशवाद में कूदे। इस दौरान पॉर्च्युगीज, स्पेनिश और फ्रेंच लिंग्वा फ्रांका की दौड़ में रहीं। इंग्लैंड में स्थिति ऐसी थी कि राजघराने में शिक्षा फ्रेंच भाषा में ली जाती थी। सभ्य समाज में अंग्रेजी गरीबों की भाषा और दरिद्रता की निशानी मानी जाती थी।

17वीं सदी के अंत में स्पेन का युद्ध इंग्लैंड से हुआ, जिसमें इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ की जीत हुई। कुछ ही वर्षों में इंग्लैंड की नौसेना विश्व में सबसे शक्तिशाली बनी और अमेरिका से लेकर चीन तक इंग्लैंड का साम्राज्य फैल गया। विश्व की अधिकतम पूंजी, तकनीक और सैन्य शक्ति में इंग्लैंड का कोई मुकाबला न बचा। लिहाजा अंग्रेजी भी विश्व की लिंग्वा फ्रांका बन कर उभरी। फिर 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के अंत में इंग्लैंड ने अपना वर्चस्व खो दिया, लेकिन चूंकि अमेरिका भी मुख्यतः अंग्रेजी भाषी था और पूंजी, तकनीकी और सैन्य ताकत में प्रथम राष्ट्र बनकर उभरा, इसलिए अंग्रेजी का दबदबा न सिर्फ बना रहा, बल्कि यह और बढ़ा।

अंग्रेजी आज भी ताकतवर है और तब तक ताकतवर रहेगी, जब तक विश्व के वित्तीय, सैन्य और तकनीकी ताकत अंग्रेजी भाषियों के पास रहेगी। आज जो हिंदी का प्रभुत्व बढ़ रहा है, वो इसलिए है क्योंकि भारत का प्रभाव भी दुनिया में बढ़ रहा है। जैैसे-जैसे यह बढ़ेगा, हिंदी भी बढ़ेगी। हिंदी लिंग्वा फ्रांका के तौर पर दुनिया में और विस्तार पाए इसके लिए जरूरी है कि भारत को अपनी वित्तीय, सैन्य और तकनीकी ताकत को बढ़ाना होगा। अंग्रेजी भाषा से लड़कर या उसका निषेध करके हिंदी लिंग्वा फ्रांका नहीं बन सकती। अंतरराष्ट्रीय संबंध शिक्षा संस्थान ने अंतरराष्ट्रीय मामलों की पढ़ाई करने वाले छात्रों को पढ़ने के लिए पांच भाषाएं सुझाई हैं। इनमें हिंदी भी है। संस्था का कहना है कि आबादी के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। यहां 24 आधिकारिक भाषाएं हैं, परंतु हिंदी लगभग सब जगह बोली जाती है और यह सबसे अधिक तेजी से बढ़ भी रही है।

दक्षिण के एक गांव में हिंदी सीखना क्यों अनिवार्य है? क्यों उत्तराखंड का एक स्कूल विदेशी लोगों के लिए विशेष हिंदी क्लास लगा रहा? और कैसे बन सकती है हिंदी वैश्विक भाषा? पढ़िए खास रिपोर्ट...

पल्लीपुरम ग्राम पंचायत अगले दो साल में 20 हजार लोगों को सिखाएगी हिंदी।

उत्तराखंड के 108 साल पुराने स्कूल में हर साल हिंदी सीखने आते हैं 200 विदेशी

उपमिता वाजपेयी | लैंडोर (मसूरी)

आगे -आगे, पीछे-पीछे, ऊपर-ऊपर, नीचे-नीचे, पास-पास, दूर-दूर...। ये गाना गुनगुनाते कई विदेशी चेहरे आपको उत्तराखंड में मसूरी के पास बसे लैंडोर के भाषा स्कूल में दिख जाएंगे। गाना गाकर हिंदी सिखाने वाला यह देश का सबसे पुराना (लगभग 108 साल) और अनोखा भाषा स्कूल है। यहां हर साल 200 विदेशी हिंदी सीखने आते हैं। वैसे तो इस स्कूल में हिंदी के अलावा पंजाबी, उर्दू, संस्कृत और गढ़वाली भाषा भी सिखाई जाती है लेकिन 80-90% हिंदी सीखने वाले ही होते हैं। फिलहाल यहां 17 शिक्षक हैं। लंबे समय से स्कूल में पढ़ा रहे हबीब अहमद उत्तरप्रदेश से हैं। वे कहते हैं ये स्कूल एक अलग ही संसार है, जहां विदेशी हिंदी, उर्दू, संस्कृत सीखने आते हैं और तीन हफ्ते से तीन महीने तक यहां गुजारते हैं।

शुरुआत में यह स्कूल अंग्रेजों ने मिशनरीज के लिए बनवाया था। अंग्रेजों के जाने के बाद भी कई साल तक सिर्फ मिशनरीज को ही दाखिला दिया जाता था। अब इस स्कूल का संचालन एक बोर्ड करता है। यहां आने वालों में शोधकर्ता, दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी, राजदूत और फिल्मी सितारे होते हैं। दाखिला लेने वालों की उम्र 18 से लेकर 90 साल तक है। सबसे ज्यादा हिंदी सीखने वाले अमेरिका से होते हैं। निकोल इन दिनों इंग्लैड से यहां आकर हिंदी सीख रहे हैं। जबकि रांची में रिसर्च कर रही जूलियट पोलेंड से हिंदी सीखने आई हैं।

हिंदी सिखाने के लिए स्कूल में रिकॉर्डिंग की खास व्यवस्था है। छात्र इसी रिकॉर्डिंग से सीखते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि हम भाषा जितनी ज्यादा सुनते हैं, उतनी ही जल्दी सीखते भी हैं। आम स्कूल पहले लिखना-पढ़ना सिखाते हैं, लेकिन यहां पहले बोलना, फिर व्याकरण और फिर लिखना सिखाया जाता है। यही नहीं, शिक्षकों ऐसे तरीके ईजाद करने की कोशिश करते हैं, जिससे सीखना उबाऊ न हो। हर दिन 4 घंटे पढ़ाई होती है। हर घंटे की फीस 385 से 653 रुपए तक है।

स्कूल में हर दिन चार घंटे पढ़ाई होती है। हर घंटे की फीस 653 रुपए है।

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