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यहीं किसी चट्टान पर बैठ, भीम ने घंटों निहारा होगा प्रतिशोध में लहराते द्रौपदी के केशों को
भीमबैठका आकर टूरिस्ट सोचते होंगे-
सिटी रिपोर्टर . भोपाल
यहीं कहीं किसी चट्टान पर बैठ, भीम ने घंटों निहारा होगा प्रतिशोध में द्रोपदी के लहराते केशों को, द्रोपदी के केश क्या सचमुच इतने लहरीले थे कि उनकी लहर में खो जाती थी निर्वासित भीम की निगाह? कई कई अपमानों के बाद एक स्त्री उठा लेती है अपना कर, भीमबैठका उठी हुई दिखाई देती है दूर से। भीम जब आए होंगे, तब क्या किया होगा उन्होंने यहां, क्या सोचते रहे होंगे, सोचते सोचते झपकी तो नहीं आ जाती होगी उन्हें, क्योंकि झपकी आ जाने पर लुढ़क पड़ते हैं बड़े-बड़े लोग, तब क्या करती है भीमबैठका...
कविता की इन्हीं लाइनों पर मंच पर अपने हाव-भाव से लोक जीवन में सदियों से संचित पांडवों के वनवास काल की कहानी बयां कर रहे थे मंगलेश सिंगारिया। मौका था जनजातीय संग्रहालय में शुक्रवार को भीमबैठका कविता एकाग्र नाट्य की प्रस्तुति का। यह कविता डॉ. विजय बहादुर सिंह की लिखी हुई है, जिसे नाट्य के लिए इस्तेमाल किया निर्देशक संजय श्रोतीय ने।
2005 में छपी इस कविता के जरिये डॉ. सिंह ने यह बयां करने की कोशिश की है कि भीमबैठका में रॉक पेंटिंग को देखकर पर्यटकों के मन में क्या विचार उठते हैं। वहीं निर्देशक ने सवा घंटे के इस सोलो प्ले में प्रकृति के दोहन, नष्ट हो रही सभ्यता को भी दिखाया है।
टी-शर्ट, ट्रैक पैंट्स, स्पोर्ट्स शू में पांडवों की कहानी बयां करता एक टूरिस्ट...
{मंगलेश ने इस दौरान भीम, द्रौपदी, कुंती, दुर्योधन, धर्मराज के पात्र निभाए। पांडवों की कहानी कहते हुए वह टी-शर्ट, ट्रैक पैंट्स और स्पोर्ट्स शू पहने नजर आए। इस पर निर्देशक का कहना है, कि यह एक टूरिस्ट के उद्गार हैं, इसलिए ऐसी ड्रेस रखी गई।