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िनगम का अजब सिस्टम, राशि भरो और चाहे जितने पेड़ काटो
सहायक आयुक्त के पास है अनुमति देने के अधिकार
केरवा के 10.50 एकड़ क्षेत्र में 203 पेड़ों को काटने की अनुमति के मामले ने नगर निगम में पेड़ कटाई की अनुमति की प्रक्रिया की हकीकत सामने ला दी है। नगर निगम में पेड़ काटने की अनुमति देने के अधिकार एक सहायक आयुक्त स्तर के अधिकारी के पास हैं। चाहे एक पेड़ काटना हो या एक हजार सीपीए में राशि जमा कराने के बाद नगर निगम से अनुमति मिल जाती है। एक बड़ा पेड़ काटने के लिए 5800 रुपए और छोटे पेड़ के लिए केवल 2900 रुपए जमा कराना होते हैं।
बड़े पेड़ की एवज में 4 गुना व छोटे पेड़ की एवज में दोगुना क्षतिपूर्ति पौधरोपण का दावा किया जाता है, लेकिन जिस तेजी से शहर की हरियाली कम हो रही है उससे लगता है कि यह रकम केवल सरकारी खाते में जमा हो रही है। इसका उपयोग पेड़ लगाने में नहीं हो रहा। खास बात यह भी है कि पेड़ कटाई के इन आवेदनों के बारे में निगमायुक्त या अपर आयुक्त को जानकारी ही नहीं होती है। वृक्ष अधिनियम (ट्री एक्ट) में निगम आयुक्त को वृक्ष अधिकारी (ट्री अॉफिसर) के अधिकार दिए गए हैं। यानी पेड़ कटाई की अनुमति देने का अधिकार निगमायुक्त को होता है। पिछले कई वर्षों से निगमायुक्त ने अपने यह अधिकार उपायुक्तस्तर के अधिकारियों को सौंप रखे हैं। वर्तमान में सहायक आयुक्त मनोज मौर्य को वृक्ष अधिकारी के अधिकार दिए गए हैं।
जिन पेड़ों को काटा, उन पर वन विभाग के नंबर थे
नगर निगम और सीपीए में खींचतान
नगर निगम के अफसरों का तर्क है कि निगम में पेड़ और वन आदि के बारे में कोई जानकार या विशेषज्ञ अधिकारी नहीं है। इस वजह से पेड़ कटाई के आवेदनों को सीपीए (राजधानी परियोजना प्रशासन) भेजा जाता है। सीपीए मौका मुआयना कर अनुमति जारी करता है। इसके अलावा क्षतिपूर्ति पौधरोपण की जिम्मेदारी भी सीपीए की है। खास बात यह है कि इस मामले में सीपीए ने मौका मुआयना करने के बाद भी पेड़ कटाई की एनओसी जारी कर दी। सीपीए के सीसीएफ संजय श्रीवास्तव का कहना है कि वे सोमवार को दफ्तर खुलने पर ही इस बारे में जानकारी दे सकते हैं। इस मामले में एक तथ्य यह भी है कि सीपीए में जमा होने वाली राशि व शहर में होने वाले क्षतिपूर्ति पौधरोपण पर भी विवाद की स्थिति बनी रहती है।
जमीन निजी हो सकती है, लेकिन यह जंगल का ही हिस्सा
सामाजिक कार्यकर्ता राशिद नूर खान ने कहा कि नगर निगम ने जिन पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी उन पर तो वन विभाग के नंबर दर्ज थे, यानी वन विभाग इसे जंगल का ही हिस्सा मानता है। राजस्व भूमि होने के कारण यह वन विभाग के अधीन नहीं है। एनजीटी ने मैपिंग के अपने आदेश में केवल वन भूमि ही नहीं, बल्कि राजस्व भूमि पर लगे पेड़ों को भी मैपिंग में शामिल करने को कहा है। जमीन निजी हो सकती है, लेकिन यह जंगल का ही हिस्सा होगी।
पेड़ कटाई की अनुमति की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर रहे हैं, जल्द बदलाव करेंगे
केरवा क्षेत्र में 203 पेड़ कटने के बाद उठे सवाल