कोरोना में एक निर्णायक और मानवीय नेतृत्व की जरूरत

Dhar News - सामाजिक, आर्थिक तौर पर सर्वाधिक प्रभावित होने वाले लोगों पर ध्यान देना हो सरकार की प्राथमिकता यह शायद एक कम...

Mar 27, 2020, 07:00 AM IST
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सामाजिक, आर्थिक तौर पर सर्वाधिक प्रभावित होने वाले लोगों पर ध्यान देना हो सरकार की प्राथमिकता

यह शायद एक कम ज्ञात तथ्य है कि एक प्राकृतिक आपदा ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक कॅरियर को नाटकीय तौर पर बदल दिया था। 2001 में कच्छ के भूकंप के दौरान राहत कार्यों में कथित लापरवाही की वजह से गुजरात की केशूभाई सरकार को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने हटाकर उनकी जगह मोदी को भेज दिया था। कोरोना कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि सदी में एक बार होने वाली वैश्विक महामारी है। कच्छ में नियंत्रण होने लायक स्थिति थी। लेकिन, कोविड-19 जैसी मेडिकल इमर्जेंसी में ऐसा कोेई मौका नहीं होता। यह ऐसा संकट है, जहां जरा सी भी विश्वसनीयता के साथ यह नहीं कह सकता कि आगे क्या होगा। चीन जैसे निरंकुश देशों से लेकर अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों तक हर कोई वायरस को नियंत्रित करने के लिए संघर्षरत है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने काम करने के अस्थिर तरीके की वजह से उतने ही एक्सपोज हुए हैं, जितना कि शुरुआत में वुहान में इस बीमारी से निपटने के गैरपारदर्शी तरीके की वजह से चीन। इसलिए यह महामारी दुनिया के आज के नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैदा करती है। इस संदर्भ में मोदी कोई अपवाद नहीं हैं।

मोदी के नेतृत्व का तरीका एक राजनीतिक दबंग की उनकी छवि के चारों ओर बुना हुआ है, जो जोखिम लेते हैं। एक हिंदुत्व हीरो से एक शासन गुरु के तौर पर उनका उभरना हर वक्त उनकी छवि गढ़ने के लिए काम करने वाले तंत्र की वजह से है। इसे 2019 के चुनाव में उनकी एक लाइन ‘मोदी है तो मुमकिन है’ से समझा जा सकता है। इसने मोदी छवि को इतना बड़ा कर दिया कि हकीकत और भ्रम में अंतर करने वाली लाइन ही धुंधली हो गई। लेकिन, कोराेना को नियंत्रित करने में किसी भी तरह के भ्रम को पैदा करने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसे अच्छे शब्दों या चमकदार इवेंट करके नियंत्रित नहीं किया जा सकता, इसके लिए सख्त रुख और इसके फैलाव पर ध्यान की जरूरत है। एक आतंकी शिविर को धमाके से उड़ा सकते हैं, वायरस को नहीं। बीमारी पर विजय मेडिकल और वैज्ञानिक खोज से ही हो सकती है।

प्रधानमंत्री के 21 दिन के राष्ट्रीय कर्फ्यू (देशबंदी) की घोषणा की 2016 के नोटबंदी के फैसले से तुलना करें। नोटबंदी एक अकेले व्यक्ति की सोच पर आधारित फैसला था। इसके विपरीत कोरोना लॉकडाउन दुनियाभर में स्वीकार्य तरीका है, क्योंकि संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए दर्जनों देश सोशल डिस्टेंसिंग को ही कारगर मान रहे हैं। नोटबंदी की आलोचना इसलिए की जा सकती है कि यह भ्रष्टाचार की बीमारी के खिलाफ हथौड़े के प्रहार जैसा था, जबकि इससे निपटने के लिए कम गड़बड़ी वाले तरीके भी थे। कोरोना वायरस के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए तीन हफ्ते की देशबंदी के इरादे या जरूरत पर कोई विवाद नहीं हो सकता। दिक्कत वहां पैदा होती है, जब एक प्रतिरोधक कदम उन लोगों को मुअावजा देने की घोषणा के बगैर लागू होता है, जो इससे सर्वाधिक प्रभावित होने वाले हैं। लोगों के इधर-उधर घूमने पर सख्ती की बात समझ में आती है, लेकिन, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के एेसे प्रतिबंधों को लागू करना एक और बड़ी आपदा की शुरुआत हो सकती है। गरीबाें, विशेषकर शहरी गरीबों के लिए एक बड़ा और सही दिशा वाला वित्तीय पैकेज कुछ हद तक देशबंदी से उन पर पड़ने वाले सामाजिक और आर्थिक भार को कम कर सकता है।

यही वजह है कि कोरोना में न केवल एक मजबूत व निर्णायक, बल्कि एक मानवीय संवेदनाओं वाले नेतृत्व की जरूरत है। लॉकडाउन में सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी रूप में जरूरी चीजों की आपूर्ति बाधित न हो। वर्ना दुकानों के बाहर लाइनें लग सकती हैं, जो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए ठीक नहीं होगा। पीएम की घोषणा के बाद ही सामान खरीदने की होड़ लग गई थी। इससे पता चलता है कि लोगों को सरकार के वादों पर भरोसा नहीं है, इसलिए यह सरकार की परीक्षा भी है। लॉकडाउन के लिए केंद्र व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की भी जरूरत है। निश्चित तौर पर यह जितनी लोगों को प्रभावित करने की मोदी की क्षमता की परीक्षा है, उतना ही जनता से जुड़ने की मुख्यमंत्रियों की क्षमता का इम्तिहान भी है। अनेक मुख्यमंत्री नियमित तौर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। इतनी बड़ी जनसंख्या में आक्रामक संचार अभियान से ही जागरूकता आ सकती है। यह मौका न तो किसी एक के राजनीतिक रूप से हावी होने का है और न ही विपक्ष के इस तर्क का कि सरकार अगर इसे बाद में लागू करती तो बेहतर तैयारी हो सकती थी। हां, हमें एक निर्णायक लेकिन, अधिक गरिमापूर्ण और सहानुभूति रखने वाले नेतृत्व की जरूरत है।

पुनश्च: जब संसद सत्र मार्च के तीसरे हफ्ते मंे प्रवेश कर गया तो मैंने सरकार के एक मंत्री से पूछा कि कोरोना की वजह से संसद को स्थगित क्यों नहीं किया गया। उसने चिड़चिड़ाते हुए मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘क्या आप पत्रकार यह सोचते हो कि आप हमसे ज्यादा जानते हो।’ कोरोना के दौर में राजनीतिक अहंकार की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

(यह लेखक के अपने विचार हैं।)



राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

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