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कुशल शासक के साथ तलवारबाज और तीरंदाज भी थीं अहिल्याबाई**
अहिल्याबाई होलकर अच्छी शासक होने के साथ ही कुशल तीरंदाज और तलवारबाज भी थीं। उन्होंने कई युद्धों में सेना का नेतृत्व किया और हाथी, घोड़े पर सवार होकर दुश्मनों का सामना किया। उनके अदम्य साहस और अद्भुत प्रतिभा को देखकर
बड़े-बड़े महाराजा एवं प्रभावशाली शासक भी हैरत में पड़ जाते थे।
अहमदनगर के चौड़ी गांव में 1725 में जन्मीं अहिल्याबाई होलकर लंबे समय तक इंदौर की शासक रहीं। उन्होंने अपने शासनकाल में हजारों सामाजिक और धार्मिक कार्य किए। बेहतर शासक होने के अलावा भी उनकी एक और पहचान थी। वह युद्ध कौशल और तीरंदाजी में माहिर थीं। दरअसल मल्हारराव अपनी पुत्रवधू अहिल्या को राजकाज, सैन्य और प्रशासनिक मामलों में निपुण बनाने के लिए शिक्षा देते थे। उन्होंने अहिल्याबाई को घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी के हुनर में माहिर बना दिया था। ससुर मल्हारराव और पति खांडेराव होलकर की मृत्यु के बाद जब अहिल्याबाई ने सत्ता संभाली, उस समय राज्य में चोरी, लूट और हत्या की वारदातें बढ़ रही थीं। इन्हें रोकने के लिए उन्होंने खुद जिम्मेदारी संभाली। राज्य में कई चोर, लुटेरों को अपनी तीरंदाजी का निशाना बनाया।
लूटपाट की घटनाओं में आमतौर पर पिंडारी शामिल रहते थे। पिंडारियों का मुख्य हथियार तीर-कमान था। उन दिनों कहा जाता था कि जो पिंडारियों के तीरों का सामना सफलतापूर्वक कर लेता है, वही सच्चा बहादुर है। अहिल्याबाई ने अपनी तीरंदाजी से सैकड़ों पिंडारियों को वश में कर लिया। कई मोर्चों पर पिंडारियों ने उनके आगे हथियार डाल दिए। बाद में अहिल्याबाई ने इन पिंडारियों को अपनी सेना में शामिल किया और उन्हें इंदौर की सीमाओं की सुरक्षा सौंपी।
वृंदावनलाल वर्मा की किताब अहिल्याबाई (उदयीकरण) के मुताबिक इंदौर से करीब 70 कोस दूर रामपुरा और भानपुरा में चंद्रावतों ने अशांति फैला दी थी। वे इसे हथियाना चाहते थे। तब अहिल्याबाई ने उनका दमन करने के लिए युद्ध किया। उन्होंने खुद सैन्य संचालन किया और तेज घुड़सवारी और तीरंदाजी के बूते इस युद्ध में फतह हासिल की।
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विधवाओं के हक में कानून बदला
अहिल्याबाई होलकर महिला सशक्तिकरण की पक्षधर थीं। उन्होंने महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए कई कार्य किए। उनके शासन संभालने से पहले नियम था, अगर कोई महिला विधवा हो जाए और उसका पुत्र न हो, तो उसकी संपत्ति राजकोष में जमा कर दी जाती थी। उन दिनों विधवा को पुत्र गोद लेने का अधिकार भी नहीं था। अहिल्याबाई ने कानून में बदलाव कर विधवाओं को पति की संपत्ति में अधिकार दिलाया और बेटे को गोद लेने की स्वतंत्रता भी दी। इसके अलावा उन्होंने द्वारिका, रामेश्वर, बद्रीनाथ, सोमनाथ, अयोध्या, जगन्नाथपुरी, काशी, गया, मथुरा और हरिद्वार सहित कई शहरों में मंदिरों का जीर्णोंद्धार कराया और धर्मशालाएं बनवाईं। बनारस में अन्नपूर्णा मंदिर और गया में विष्णु मंदिर बनवाया। सुगम आवागमन के लिए उन्होंने कलकत्ता से बनारस तक की सड़क का निर्माण कराया।
कई मोर्चों पर पिंडारियों ने अहिल्याबाई के आगे हथियार डाल दिए**