रिश्तों में ऐसी दूरियां आ गई हैं कि घर शरणार्थी शिविर बनकर रह गए हैं

News - सिटी रिपोर्टर. इंदौर \"कुछ साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक रिसर्च की थी जिसके नतीजे यह कहते हैं कि 21वीं...

Feb 15, 2020, 07:55 AM IST
Indore News - mp news there have been such distances in the relationship that the houses have become a refugee camp

सिटी रिपोर्टर. इंदौर

"कुछ साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक रिसर्च की थी जिसके नतीजे यह कहते हैं कि 21वीं सदी का समाज तनावग्रस्त और नैराश्य से भरा होगा। इसका मुख्य कारण है "शादी' नाम की व्यवस्था के टूटने से जन्मा सिंगल पेरेंटिंग कल्चर। बच्चों को मां और पिता दोनों की समान ज़रूरत है। हमारे समाज में बच्चों की परवरिश, उन्हें संस्कारित करना, उनका ख़याल रखना स्त्रियों का काम माना गया है। इसीलिए तो बच्चे अक्सर फादर हंगर महसूस करते हैं और यह बड़ी समस्या है। मोबाइल, टीवी और इंटरनेट की बदौलत रिश्तों में ऐसी संवादहीनता आ गई है कि बच्चे पेरेंट हंगर से जूझ रहे हैं और स्थिति यही रही तो वह युवा पीढ़ी जिससे हमें बड़ी उम्मीदें हैं, वह इतने गहरे अवसाद में चली जाएगी कि सारे स्वप्न अधूरे रह जाएंगे। जिस युवा की ओर हिंदुस्तान टकटकी लगाए बैठा है, वह तो कैशबैक और पब्जी के चक्कर में उलझा है। इससे उबरने के लिए उनमें तीन नैतिक मूल्यों का बीजारोपण करना ज़रूरी है। ये मूल्य हैं - करुणा, कृतज्ञता और श्रद्धा। एक पौराणिक प्रसंग से इसे समझिए... वैवस्तत्व मनु ने अर्घ्य देने के लिए अंजुलि में पानी लिया तो उसमे एक छोटी मछली आ गई। मनु उस मछली को पानी में छोड़ने लगे तो मछली ने कहा - मुझे समुद्र में मत छोड़ो, मुझे संरक्षण दो। मैं संकट के समय तुम्हारी मदद करूंगी। मनु के मन में जो भाव जगे वो है करुणा। दूसरा मूल्य जो मछली ने दिखाया वो है कृतज्ञता। यानी जिसने अहसान किए हैं, उसके प्रति कृतज्ञ रहना। इन दोनों मूल्यों को धारण करने के लिए जो मूल्य जरूरी है, वो है श्रद्धा। आज परिवारों में बच्चों को यही तीन मूल्य हम नहीं दे पा रहे हैं और इन्हीं मूल्यों के अभाव का परिणाम है गूंगे होते परिवार। रिश्तों में आई संवादहीनता। खुशहाल परिवारों से ही खुशहाल समाज का निर्माण कर सकेंगे हम और तब ही राष्ट्र सुदृढ़ होगा।

लोग आलीशान मकान बना रहे हैं, लेकिन उस मकान को घर नहीं बना पा रहे। और घर तब बनता है जब रिश्तों में प्रेम और अपनत्व की गर्माहट होती है। याद रखिए कि परिवार साधनों से नहीं, साधना से बनते हैं। बच्चों को सुविधाओं की रिश्वत नहीं अपनापन दीजिए।'

विवेक घलसासी

पैदाइशी तो हर जीव पशु ही है, संस्कार उसे मनुष्य बनाते हैं...**

मनुष्य जन्म के समय पशु समान ही होता है। संस्कारों का बीजारोपण कर उसे मनुष्य बनाया जाता है। भारत में मनुष्य व्यक्ति निर्माण का कार्य परिवार करता है। हमारे पूर्वजों, ऋषि-मनीषियों ने बहुत चिंतन कर यह ध्येय स्थापित किया है लेकिन आज परिवार की स्थिति ऐसी हो गई है कि हम परिवार को कुटुंब कहने के अधिकारी भी नहीं हैं। हालात ये हैं कि परिवार रैनबसेरा बनकर रह गए हैं। घर शरणार्थियों के शिविर जैसे बन गए हैं। घर के सदस्यों में सिर्फ एक ही बात कॉमन है कि उनका पता समान है। पर्याप्त साधन और सुविधाओं के बाद भी परिवार में अंदर से भयभीत करने वाला खालीपन है।

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