दूसरों से पहले सोचने के अपने फायदे हैं
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु [raghu@dbcorp.in]
फंडा यह है कि बाजार में हमेशा पहले शुरुआत करने का फायदा मिलता है। फिर चाहे बात गैरेज से शुरू होने वाले एक छोटे से व्यवसाय की हो या करोड़ों के निवेश के साथ शुरू हुए बड़े व्यवसाय की।
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क ई इतिहासकारों को मप्र के नरसिंहपुर जिले का गाडरवारा
1901 में मराठा साम्राज्य के मुख्यालय के रूप में याद होगा, जहां केवल 6,198 लोग रहते थे। अगले 110 वर्षों में यहां की जनसंख्या बढ़कर 60,000 हो गई और इसे रजनीश (ओशो) के बचपन के घर के रूप में जाना जाने लगा। लेकिन, जब मैं इस रविवार को यहां कुछ घंटे ठहरा, तो मैंने यहां कई नई संस्कृतियां देखीं। जैसे कि जब मैं एक होटल में मीटिंग के लिए गया था, तब वहां एक घंटे में तीन जन्मदिन के केक काटे गए और कॉलेज जाने वाले युवा कोरस में जन्मदिन की शुभकामनाएं दे रहे थे। स्टेशन रोड पर सरसरी निगाह व कुछ निवासियों से बात करने पर पता चला कि कैसे वह शहर जिसका वर्णन करना मुश्किल रहा है, आधुनिक दुनिया को अपना रहा है, साथ ही उन महिलाओं को भी प्रोत्साहन दे रहा है, जिनमें उच्च आकांक्षा और प्रगति की भूख है। कुछ महिलाएं ऐसी हैं जो छोटे से एक कमरे में अपना व्यवसाय चला रही हैं, तो कुछ ऐसी हैं जिनमें खुद को साबित करने की आग है। इससे मुझे हाल ही में पढ़ी गई हैदराबाद में 37 साल पहले शुरू हुए एक बिजनेस की कहानी याद आई। यह व्यवसाय युवा बहनों ने तब शुरू किया था, जब ‘ग्रूमिंग’ और ‘स्टाइलिंग’ आम बात नहीं थी, खासतौर पर अगर कोई व्यक्ति तेलुगु फिल्मों के शोबिज या आतिथ्य उद्योग से न जुड़ा हो। उन दिनों ब्यूटीशियन बनना कठिन हुआ करता था। लेकिन आत्मविश्वास और माता-पिता के सहयोग के साथ, चार बहनों, अनुराधा चेप्याला, पोल्सानी अन्नपूर्णा और जुड़वां बहनें तक्कल्लपल्ली अनुपमा और अनिरुद्धा मिर्यला ने न केवल हैदराबाद में बल्कि, सिकंदराबाद तक में सौंदर्य व्यवसाय का चेहरा बदल दिया।
खास बात यह है उन्होंने एक गैरेज में अपना व्यवसाय शुरू किया। ये विचार उन्हें उनके पिता तिरुपति राव ने दिया था जो उस वक्त नगरपालिका आयुक्त थे। लड़कियों ने पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ सौंदर्य उद्योग में अपनी रुचि को भी पूरा किया। दिलचस्प बात यह है कि उनके पिता के ओहदे के बावजूद, बच्चों पर कोई पाबंदी नहीं थी और वे जो चाहें कर सकते थे। अब उनके पिता को नारीवादी कहें या दूरदर्शी, उन्होंने बच्चों और प|ी को भी पढ़ाई करने और प्रतियोगी परीक्षा देने के लिए प्रोत्साहित किया। जब अनुराधा और अन्नपूर्णा ने अपने तिलक नगर स्थित घर के गैरेज में ब्यूटी सैलून ‘अनूस’ शुरू किया, तो कॉलोनी में एक बड़ा उत्सव मनाया गया। अधिकांश निवासी उनके परिचित थे और सामाजिक वर्जना के बावजूद अपनी बेटियों को दुल्हन के मेकअप, वैक्सिंग और फेशियल के लिए ले लाते थे। शुरुआत में उनके ग्राहक कम थे, लेकिन संख्या बढ़ती गई। फिर उनकी दो कजिन बहनें भी उनके साथ जुड़ गईं और उन्हें बड़ी जगह की जरूरत पड़ी। उन्होंने अपने घर के एक हिस्से में सैलून को विस्तार दिया। वे अपने पिता को किराया भी देती थीं। सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने अपने अंकल-आंटियों द्वारा दी गईं बुरी टिप्पणियों को अनसुना कर दिया था। उनका कहना था कि लड़कियां दूसरों के बाल नहीं काटतीं!
शादी होने के बाद चारों बहनें हैदराबाद और सिकंदराबाद के विभिन्न क्षेत्रों में चली गईं और वहां उन्होंने अपनी शाखाएं शुरू कीं। बहनों ने सौंदर्य का कौशल सिखाने वाले अंतरराष्ट्रीय कॉलेजों में दाखिला लिया और इस कला में महारत हासिल की। अब अनिरुद्धा अमेरिका में रहती हैं और उन्होंने फ्लोरिडा में ‘अनूस’ की शाखा खोली है। आज, लगभग 500 लड़कियां उनके संस्थानों में नौकरी कर रही हैं। परिवार के लिए इस ब्रांड को बनाने में कई साल लग गए और वो आज भी उसी जुनून के साथ काम कर रही हैं। अन्नपूर्णा का ही उदाहरण ले लीजिए, जो अब दादी बन चुकी हैं, इसके बावजूद अगर वो सुबह 9 बजे काम के लिए न निकलें तो उन्हें अपने पिता से डांट पड़ती है। जाहिर है बेटियां अपने 85 वर्षीय पिता, जो कि सख्त नगरपालिका आयुक्त रह चुके हैं, उनसे ही प्रेरित होती हैं।