हजारों बूंदें आती हैं, मुक्केबाजी करती हैं मेरे घर के साथ

News - \"जब धर्मशाला में बारिश होती है, तब हजारों की तादाद में बूंदें आती हैं और मुक्केबाजी करती हैं मेरे घर के साथ...’ यह...

Bhaskar News Network

Nov 11, 2019, 07:10 AM IST
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"जब धर्मशाला में बारिश होती है, तब हजारों की तादाद में बूंदें आती हैं और मुक्केबाजी करती हैं मेरे घर के साथ...’

यह हिंदी अनुवाद था तिनजिंग की सुनाई कविता का, जो उन्होंने तिब्बती भाषा में सुनाई। मौका था टैगोर अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव विश्व रंग के आखिरी दिन हुए सत्र- ‘अंतरराष्ट्रीय कविता का एक मंच’ का। यहां विभिन्न देशों के कवियों ने अपनी मूल भाषाओं में कविताओं का पाठ किया। उनके कविता पाठ के बाद हिंदी अनुवाद का भी पाठ किया गया। बांग्लादेश ओबैद आकाश ने बंगाली भाषा में ‘रॉक्तो धारा’ कवित सुनाई, जिसका अनुवाद था- जिस मछली का मोलभाव बातों से हाथापाई में उलझ गया, तब कतला का सिर उचककर मेरे थैले में आकर गिरा। फिलीपींस से मार्रा लानोट, रूस से इगोर सैफ ने भी कविताएं सुनाईं।

जब बचपन से ही मां बच्चे से अंग्रेजी में बात करेगी तो ‘लोक’ वहीं खत्म हो जाएगा

‘लोक’ केवल चित्रकारी और नृत्य ही नहीं है। हमारे परिवारों में अब बच्चों को अंग्रेजी सीखने पर जोर दिया जा रहा है, जब बचपन से ही मां अपने बच्चे से अंग्रेजी में बात करने की कोशिश करती है तभी उसका ‘लोक’ खत्म हो जाता है। यह कहना है साहित्यकार सत्यकाम का। वह महादेवी सभागार में ‘लोक का उत्तर आधुनिक पक्ष’ विषय पर बोल रहे थे। इसमें नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, प्रो. देवेंद्र चौबे, महेंद्र कुमार मिश्र, प्रभु जोशी ने भी हिस्सा लिया।

इन्हें मिला सम्मान

आलोचक राहुल सिंह को युवा कथा सम्मान से नवाजा गया। वनमाली कथा सम्मान-2019 से कथाकार रणेंद्र, भगवान दास मोरवाल, कलाकार मनोज पांडे, तरुण भटनागर को नवाजा गया।

कार्यक्रम में टेक्नोलॉजी और हिंदी पर व्याख्यान हुआ। इसमें बतौर वक्ता राहुल देव, जितेंद्र चौधरी, मनीष गुप्ता, लीना मेहदेले, ओम विकास, डॉ अनुराग सीठा, अनूप भार्गव, डॉ कविता शामिल थे।

समापन सत्र

सिटी रिपोर्टर . भोपाल

विदेश में हिंदी को संस्कृति के रूप में पढ़ा रहे

‘विश्व में हिंदी: वैश्विक स्तर पर हिंदी के पाठ्यक्रम में एकरूपता की चुनौती’ पर व्याख्यान में यूक्रेन के डॉ. यूरी बोट्विकेन ने बताया- विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी को केवल एक भाषा के रूप में नहीं बल्कि एक संस्कृति के रूप में पढ़ाया जा रहा है। प्रौद्योगिकी ने शिक्षण के लिए सामग्री देने का काम किया है, लेकिन चुनौती किसी भी विदेशी भाषा को सीखने के लिए छात्रों को प्रोत्साहित करना है। इसमें डॉ. इंदिरा गजियाव (मॉस्को), डॉ. सुब्रमणि (फिजी), डॉ. सिराजुद्दीन नुरमतोव (उज्बेकिस्तान) प्रमुख वक्ता थे। सत्र का समन्वय करते हुए डॉ. संतोष चौबे ने कहा वैश्विक भाषा बनने के लिए हिंदी के रास्ते में अभी भी कई बाधाएं हैं।

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