व्यापारियों ने प्रलोभन देकर नागा की ज्ञान पद्धति राज्य के बाहर पहुंचा दी

News - ‘नागा जनजाति के पास अपना पारंपरिक हर्बल रहस्य था, लेकिन अब यह विशुद्ध रूप से नागा का नहीं रह गया है। गैर-नागा...

Nov 11, 2019, 07:10 AM IST
‘नागा जनजाति के पास अपना पारंपरिक हर्बल रहस्य था, लेकिन अब यह विशुद्ध रूप से नागा का नहीं रह गया है। गैर-नागा विद्वान आए और अपने लाभ के लिए नागा के बौद्धिक और सांस्कृतिक ज्ञान चालाकी से अपने साथ ले गए। इस कारण नागा विद्वानों को जो अवसर प्राप्त होने थे वे नहीं हो पाए। नागा समुदाय को यह रहस्य समुदाय के बाहर बताने की अनुमति नहीं थी, लेकिन व्यापारियों ने प्रलोभन देकर, उनकी भावनाओं के साथ खेलकर पूरी ज्ञान पद्धति को राज्य के बाहर पहुंचा दिया गया।’ यह कहना है पूर्वोत्तर भारत की लेखिका और कवियत्री ईस्टरीन कीर का। वह रविवार से इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में शुरू हुए जनजातीय साहित्य महोत्सव में बोल रही थीं। तीन दिनों तक चलने वाला यह महोत्सव संग्रहालय के बड़ी झील किनारे स्थित मरू ग्राम मुक्ताकाश प्रदर्शनी स्थल पर हो रहा है। इसमें जनजातीय साहित्य पर चर्चा, फूड फेस्टिवल, सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे।

महोत्सव में डांस, फूड और हस्तशिल्प भी...

भोटिया डांस

सिक्किम का रेड पांडा।

गुजरात की चादर

मप्र का वुड वर्क

मैदानी जनजातियों का मौखिक-लिखित साहित्य

मणिपुर के साहित्यकार और आईएएस ऑफिसर वाई.डी. थोंगची ने कहा- पर्वतीय भागों में बसने वाले जनजातीय लोगों का मौखिक साहित्य है। मैदानी क्षेत्रों की जनजातियों में मौखिक एवं लिखित साहित्य दोनों हैं। इस दौरान जनजातीय साहित्य की पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।

आर्थिक उन्नति प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित

विशेषज्ञ हरीराम मीणा ने कहा- पूरी दुनिया में आज विकास का ढांचा केवल आर्थिक उन्नति को ध्यान में रखे हुए है। आर्थिक उन्नति भी प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर आधारित है, जो सारी पृथ्वी के लिए विध्वंसक है।

जायका में लजीज व्यंजन

जनजातीय महोत्सव में शामिल होने पहुंचे लोगों के लिए सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बना जायका फूड फेस्टिवल। यहां 10 राज्यों के लजीज जनजातीय व्यंजनों का स्वाद चखने का मौका मिला। इसमें वेज और नॉनवेज फूड परोसे गए। इसमें झारखंड का ढुस्का, आलू-चना की सब्जी, मंडुआ व मक्के की रोटी, भाप में बना गुड़ पीठा, सूखी साग पसंद किए गए।

जनजातीय विशेषज्ञ बोले-

प्रकृति के नियमों का पालन न करने से संघर्ष कर रही हैं जनजातियां

विशिष्ट अतिथि सत्यनारायण मुंडा ने कहा- जनजातीय लोग प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर जीवन यापन करते थे। वर्तमान में प्रकृति के नियमों का पालन न करने से उन्हें संर्घषों का सामना करना पड़ रहा है। जंगली जानवरों का शहरों के तरफ प्रवेश ऐसी ही एक समस्या है।

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