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रानी बावड़ी देख वाकणकर ने पीएचडी करने को कहा

एक वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर . भोपाल

‘गुजरात में 11वीं शताब्दी की एक बावड़ी है, दुनिया की सबसे बड़ी बावड़ी है। उस समय गुजरात में सबसे ज्यादा बावड़ियां बनाई जाती थीं क्योंकि पानी के साधन वही होते थे। जब मेरी पोस्टिंग गुजरात में हुई और मैं बावड़ियां देखने पहुंचा तो पाया कि कई बावड़ियां दबी हुई थीं। मैंने विभाग के साथ मिलकर उसकी खुदाई 120 फीट तक कराई, जिसमें मूर्तियां मिलीं। कुछ दिनों बाद वाकणकर वहां आए। उन्होंने कहा- इतनी बड़ी बावड़ी है इस पर पीएचडी कर सकते हो और उन्होंने वहीं पर सिनोप्सिस भी बना के दिया और मेरी पीएचडी हो गई। उस बावड़ी में विष्णु दशावतार, विष्णु के 24 स्वरूप, अप्सराओं की मूर्तियां मिलीं। साथ ही सबसे बड़ी बात यह थी कि वहां पर मूर्तियों में नाम और 700 चिह्न मिले।’

यह कहानी बयां की पुरातत्वविद नारायण व्यास ने। वह संस्कार भारती कला एवं साहित्य संस्था की ओर से डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर के जन्म शताब्दी वर्ष 2019-20 पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। इसमें उनकी लिखी किताब ‘रानी की वाव पाटन, गुजरात’ का विमोचन किया गया। इस दौरान बतौर मुख्य अतिथि पूर्व राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी मौजूद थे।

वाकणकर के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए व्यास ने कहा- मैं 1960-61 से उनके साथ हूं। मैं दीवारों पर कोयले से चित्र बनाता था, जो पिता को पंसद नहीं था तो उन्होंने वाकणकर से परिचय कराया। तभी से मैं उनके साथ काम करने लगा, स्केच बनाने लगा। उनके साथ भारत में पुरातत्व महत्व की जगहों का भ्रमण किया।

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