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क्या ग़ज़ब है कि चोट खाऊं भी और फिर दुनिया को दिखाऊं भी, मैंने हालात दिल के लिख तो दिए अब इन्हें नज़्म में सुनाऊं भी...
है दुनिया छोड़ना मंजूर लेकिन, वतन को छोड़ कर जाने का नइ
रविवार को डाॅ. राहत इंदौरी ने ग़ज़लें सुनाई तो बाॅलीवुड िसंगर केके ने हिट नंबर्स सुनाए। डीएवीवी के आईईटी के एनुअल फेस्ट आक्षांक में ये प्रस्तुति दी गईं। डाॅ. राहत इंदौरी ने कहा कि \\\'मेरी कोशिश यही रहेगी कि मैं जो कुछ भी सुनाऊं, आपके सिलेबस का हो। उन्होंने ग़ज़ल पढ़ी: राज.. जो कुछ हो, इशारों में बता भी देना, हांथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना। इसके बाद उन्होंने अपने अनूठे अंदाज में फरमाया कि :
बुलाती है, मगर जाने का नइ
ये दुनिया है, इधर जाने का नइ
है दुनिया छोड़ना मंजूर,
लेकिन वतन को छोड़कर जाने का नइ। फिर उन्होंने फरमाया: शहरों में बारूदों का मौसम है, गांव चलो ये अमरूदों का मौसम है, मेरी सांसों में समाया भी बहुत लगता है, और वही शख्स पराया भी बहुत लगता है, उससे मिलने की तमन्ना भी बहुत है, लेकिन आने जाने में किराया भी बहुत लगता है। आखिर में यह छोटी ग़ज़ल पढ़ी कि : आग के पास कभी मोम को लाकर देखूं, हो इज़ाजत तो तुझे हांथ लगाकर देखूं, दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है, सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगाकर देखूं। पंकज दीक्षित और पंकज पलाश ने भी रचना पढ़ी।
आदमी थोड़ा तो इंसान के जैसा हो जाए
हिना रिज़्वी ने ग़ज़ल पढ़ी कि कौन कहता है के हर शख़्स फ़रिश्ता हो जाए, आदमी थोड़ा तो इंसान के जैसा हो जाए। कितना मासूम नज़र आता था बचपन में मेरे, आईने में मेरा फिर से वही चेहरा हो जाए। वे फरमाती हैं कि फिर बला कोई मेरे पास से गुज़रे कैसे, जब दुआ मां की मेरे सिर का दुपट्टा हो जाए। अब बारी अब तरुणा मिश्रा थी जिन्होंने ग़ज़लपढ़ी कि है जिनके पास घड़ी, वक़्त उनके पास कहां, है वक़्त जिन पे उन्हीं पर घड़ी नहीं होती। कहानियों पे नहीं है यक़ीन बच्चों को, वो जानते हैं कि कोई परी नहीं होती। .मिज़ाज रेशमी रखने के फायदे मत पूछ, हो मिट्टी सख्त़ तो कूज़ा-गरी नही होती। अब कार्यक्रम की आखिरी शायरा परवीन कैफ को जिसे सुनने के लिए सब बैचेन थे। उन्होंने फरमाया कि हया तो उससे शरमाती बहुत है, पड़ोसन मेरी इतराती बहुत है। वो घर में चैन से रहती है कम-कम, मगर छत पर नज़र आती बहुत है। पूनम यादव ने अपनी रचनाएं पढ़ीं।
सिटी रिपोर्टर . इंदौर
केके ने गीत सुनाए
मुशायरे के बाद बाॅलीवुड सिंगर केके ने गीत सुनाए। उन्होने इंदौर का वेलकम करते हुए तू है आसमा में, गाने से शुरुआत की। इसके बाद... क्यों आजकल नींद कम, ....मेरा पहला-पहला प्यार है ये, ...सच कह रहा है दीवाना, आंखों में तेरी अजब सी जैसे कई सुपरहिट सॉन्ग्स गाए। स्टूडेंट्स भी उनके सॉन्ग्स पर झूमते हुए नजर आए।
आक्षांक फेस्ट में मशहूर शायर राहत इंदौरी ने ग़ज़लें और सिंगर केके ने गीत सुनाए
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर रूहानियत मुशायरा सफर ज़िंदगी का इस बात का खूबसूरत गवाह बना कि अलग अलग शहों से आई शायरात अपनी दुनिया. ख्वाहिशों और ख्वाबों को मार्मिकता से बयां कर रही हैं। इसमें इश्क-अो-मोहब्बत की नाज़ुक बातें थी तो अपनी ख्वाहिशों को बिंदास ढंग से कहने का साहस भी था। विजय नगर स्थिति सभागृह में रविवार को किए गए इस अदबी महफिल के मशायरे ने नारी शक्ति को सलाम करते हुए इन शायरात को अपने भावों को बयां करने का मौका दिया। यह मुशायरा इस बात का भी गवाह बना कि इन शायरात का पढ़ने का अंदाज़ में निहायत अलहदा था।
मुझसे क्या पूछते हो कैसे मै दिल में उतरू, जाओ दरिया को समुंदर में उतरता देखो : रात 8 बजे से पहले ही हाॅल भर चुका है और इस ग़ज़ब माहौल में तरुणा मिश्रा ने डाॅ. राहत इंदौरी का शेर पढ़ते हुए सीमा शर्मा मेरठी को बुलाया। सीमा शर्मा कहती हैं कि प्यार में डूब के भी कैसे उभरता हे कोई, डूबा सूरज नए मंज़र से उभरता देखो, मुझसे क्या पूछते हो कैसे मंै दिल में उतरूं, जाओ दरिया को समुंदर में उतरता देखो। उनकी इस ख्वाहिश पर श्रोताअों ने बहुत दाद दी। इसके बाद संजू शब्दिता मंच आई और अपनी ग़ज़ल से माहौल बना दिया। उन्होंने फरमाया कि क्या ग़ज़ब है कि चोट खाऊं भी और फिर दुनिया को दिखाऊं भी, मैंने हालात दिल के लिख तो दिए अब इन्हें नज़्म में सुनाऊं भी। उन्होंने आगे पढ़ा कि हमारा नाम लिखकर वो हथेली में छिपा लेना, हमेशा छत पर आ जाना शाम से पहले, तुम्हारे दम पर ही भरा था फॉर्म मैट्रिक का, तुम्हें भी रूठना था बोर्ड के एगजाम के पहले। उनकी इस दिलचस्प ग़ज़ल को भी सराहा गया।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर रविवार को किए गए मुशायरे में 8 शायरात ने ख़ूबसूरती से बयां किए अपने दिल के नाजुक हालात