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मां की ममता के बीच जब एक पहाड़ भी बौना पड़ गया

एक वर्ष पहले
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फिल्म स्क्रीनिंग

फिल्म हिरकणी का एक दृश्य।

शिवाजी महाराज के रायगढ़ का किला चार हजार चार सौ फीट की ऊं‌चाई पर बनाया गया था और कहा जाता था कि इस किले पर से या तो पानी नीचे जा सकता है या हवा ऊपर आ सकती है। 1674 में हिरकणी ने अपने बच्चे के लिए इस किले से नीचे उतरकर साहस दिखाया था। दरअसल, किले का यह नियम था कि सूर्य अस्त होने के बाद कोई भी किले से नीचे की ओर नहीं जा सकता। हिरकणी को एक दिन देर हो जाती है और उसका नवजात बच्चा किले के नीचे बनी बस्ती में घर पर रहता है। हिरकणी को नियम के अनुसार नीचे जाने नहीं दिया जाता। ऐसे में वह एक ऐसी पहाड़ी को पार कर नीचे आती है जिससे नीचे उतरना असंभव माना जाता था। वह न केवल नीचे उतरती है बल्कि जंगल पार कर अपने घर पर पहुंचती है और अपने बच्चे को संभालती है। उसके इस अदम्य साहस को देखकर स्वयं शिवाजी महाराज उसे दरबार में बुलाते है और सम्मान करते है। वे उसके बेटे का नामकरण भी करते है और एक मां का सम्मान भी।


अभिनय : फिल्म में कई साहसिक दृश्य है और सोनाली कुलकर्णी ने किरदार को जीवंत कर दिया है। फिर चाहे सहजता की बात हो या पहाड़ों पर से उतरने वाले रोमांचकारी दृश्य हों, सभी में सोनाली ने अपनी अभिनय क्षमता का संपूर्ण निचोड़ डाल दिया है। अमित खेड़ेकर ने भी शानदार अभिनय किया है।

निर्देशन : प्रसाद ओक ने अपने कल्पनाशील निर्देशन, घटनाअों को रोचक ढंग से बुनकर और रोमांच बरक़रार रखते हुए कहानी को चरितार्थ किया है। चिन्मय मांडलेकर ने स्क्रिप्ट शानदार लिखी है और अमितराज सावंत का संगीत सुरीला और रोमांचकारी दृश्य हैं। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी सुंदर है कई दृश्य बड़ी स्क्रीन पर देखने के बाद आप आश्चर्यचकित रह जाते हैं। इसके अलावा वीएफएक्स भी शानदार बन पड़े हैं। फिल्म का संपादन शहर की ही अपूर्वा मोतीवाले ने किया और उनका संपादन कौशल इसमें साफ दिखाई देता है।

इतिहस के पन्नों में अपने बच्चों के प्रति मां के अथाह प्रेम और बच्चों के लिए किसी भी हद तक जाकर साहस का काम कर दिखाने की अनेक कहानियां हैं। और ये कहानियां ऐसी मिसालें बन चुकी हैं जो आधुनिक नारी के लिए प्रेरणास्पद भी हैं। मराठी की ऐतिहासिक फिल्म हिरकणी एक ऐसी ही सत्य घटना पर आधारित साहसिक कथा है।

यह मराठी फिल्म अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मद्देनज़र यूनिवर्सिटी आॅडिटोरियम में सानंद के मंच दिखाई गई। मां की ममता का पैमाना नहीं बन सकता, मां के अतुल्य प्रेम की कल्पना ईश्वर से ही की जा सकती है और मां के अपने बच्चों के लिए किए जाने वाले अदम्य साहस की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। कहानी तो इसकी रोमांचक है लेकिन जब इस कहानी को फिल्म में रूपांतरित किया गया तो इसका प्रभाव बहुत बढ़ गया।

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