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श्री श्याम प्रभु को लगा खीर-चूरमा का भोग

एक वर्ष पहले
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श्री श्याम मित्र मंडन का चार दिवसीय रंग रंगीला फाल्गुन महोत्सव सह स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया गया। शनिवार को फाल्गुन सूदी द्वादशी को प्रातः मंगला आरती के बाद बाबा का भव्य एवं अलौकिक शृंगार गोपाल मुरारका, अशोक लडिया और मनोज खेतान ने बड़े ही श्रद्धाभाव से किया। बाबा को रंग-बिरंगे सुगंधित पुष्पों से और बादाम, काजू, पिस्ता और मेवों से बनाए गए गजरों से शृंगार किया गया।

प्रातः 7.30 बजे मनोज खेतान और स्वीटी खेतान ने सपरिवार बाबा की ज्योत प्रज्जवलित की। श्री श्याम प्रभु को अति प्रिय खीर-चूरमा का भोग अर्पित किया। प्रातः 6 बजे से ही भक्तों की लंबी कतार बाबा की ज्योत लेने को लग गई थी। भक्तों को किसी तरह कि असुविधा ना हो इसका ध्यान रखते हुए सदस्यों और कार्यकर्ताओं की एक टीम गठित की गई थी। गठित टीम के सदस्य प्रवीण सिघानिया, सूरज लोधा, रोहित अग्रवाल, शैंकी केडिया और अमित शर्मा ने सभी धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं को क्रमवार ज्योत दिलाया। भक्तों द्वारा महाप्रसाद (खीर-चूरमा) और सवामनी भोग अर्पित करवाया। अपराह्न भोग आरती में बाबा को खीर-चूरमा, काजी बड़ा, कचौरी, पूड़ी आदि नाना प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया गया। आरती के बाद भक्तों ने प्रसाद प्राप्त किया। रात्रि शयन आरती के बाद 9.30 बजे बाबा का पट मंगल किया गया। चार दिवसीय फाल्गुन रंग-रंगीला फाल्गुन महोत्सव सह स्थापना दिवस का हर्षोल्लास के साथ महोत्सव का समापन किया गया। श्री श्याम मित्र मंडल रांची के अध्यक्ष गोपाल मुरारका ने सभी सदस्यों एवं श्रद्धालुओं का महोत्सव के सफल आयोजन के लिए धन्यवाद किया।

सुबह 6 बजे से ही बाबा की ज्योत लेने को भक्तों की लंबी कतार लग गई थी

श्रद्धालुओं ने श्री श्याम मंदिर में मत्था टेक खाटू नरेश की आशीष ली

रांची | श्री श्याम मंडल द्वारा आयोजित श्री श्याम फाल्गुन सतरंगी महोत्सव के अंतिम दिन शनिवार काे श्रद्धालुओं ने खाटू नरेश के दर्शन किए। परिवार की सुख-समृद्धि की मंगलकामना की। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादशी होने के कारण सूर्योदय के साथ ही भक्तों की भीड़ श्री श्याम मंदिर में रजत सिंहासन पर विराजमान श्री श्यामदेव के दिव्य शीश का दर्शनों के लिए उमड़ पड़ी। मंदिर के पट खुलने से पहले श्री श्याम प्रभु को नए वस्त्र पहनाने के साथ मनमोहक शृंगार किया गया। श्री श्यामदेव के शीश दान के दिन प्रभु के द्वादशी दर्शन का विशेष महत्व होता है। पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में महिलाओं और पुरुषों ने खाटू नरेश के दर्शन किए।
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