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कर्नाटक चुनाव से पहले मोदी का लिंगायत कार्ड, लंदन में संत बिसवेश्वर की मूर्ति के सामने करेंगे प्रार्थना

3 वर्ष पहले
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लंदन.     नरेंद्र मोदी भले ही ब्रिटेन दौरे पर हैं, लेकिन वहां से भी वे कर्नाटक विधानसभा चुनाव को साधने की कोशिश कर रहे हैं। मोदी ने बुधवार को यहां टेम्स नदी पर स्थित लिंगायत संत बसवेश्वर के दर्शन किए और मूर्ति पर माला चढ़ाई। उन्होंने कहा कि भगवान बसवेश्वर के आदर्शों ने पूरे विश्व में लोगों को प्रेरित किया। भारत की बात सबके साथ कार्यक्रम में भी मोदी ने कहा- 12वीं सदी के इस संत ने सामाजिक सशक्तिकरण के लिए काम किया। 2015 में मोदी ने ही इस मूर्ति का अनावरण किया था। इसे कर्नाटक चुनाव से एक महीने पहले लंदन से मोदी का लिंगायत कार्ड माना जा रहा है। कांग्रेस ने पहले ही इस समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर अपनी तरफ लुभाने की कोशिश की है। राज्य में इस समुदाय की आबादी 17% है और ये चुनाव में अहम भूमिका निभाते हैं। बता दें कि कर्नाटक में 12 मई को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी है। 15 मई को नतीजे आएंगे।

 

 

संत बसवेश्वर ने महिला सशक्तिकरण के लिए काम किया- मोदी

- नरेंद्र मोदी ने भारत की बात सबके साथ कार्यक्रम में एक सवाल के जवाब में कहा, "मोदी- 12वीं सदी के ये महापुरुष हैं। भगवान बसवेश्वर के वचन पढ़ने चाहिए, ये सभी भाषाओं में उपलब्ध हैं। हमें अपनी महानताओं का पता ही नहीं हैं। संत बसवेश्वर ने लोकतंत्र के लिए 12वीं सदी से चिंतन शुरू किया। एक संस्था शुरू किया, उसमें एक महिला प्रतिनिधि रहती थीं। जाति-पाति में देश बिखरा था, उन्होंने सबको एक छत्र में लाने का बहुत बड़ा काम किया था। उनका एक वचन है कि जहां ठहराव है, वहां जिंदगी समाप्त है और जहां पर गति है, वहां जिंदगी के नए आयाम की संभावनाएं रोज नई होती हैं। उन्होंने ठहराव को मृत्यु माना है। लोकतंत्र, नारी सशक्तिकरण के लिए, सामाजिक सशक्तिकरण के लिए उन्होंने जो किया वो बेहद अहम है।"

 

 

मोदी ने 1:41 मिनट का वीडियो भी पोस्ट किया

- मोदी ने बुधवार को संत बसवेश्वर को याद करते हुए एक ट्वीट किया। इसके साथ उन्होंने 1 मिनट 41 सेकंड का एक वीडियो भी पोस्ट किया।
- यह वीडियो 2015 का है, जब मोदी ने संत बसेश्वर की इस मूर्ति का अनावरण किया था। 
- इसमें मोदी कह रहे हैं, "ओम श्री गुरु बासवा लिंगाय नम: भगवान बसवेश्वर के वचनों से, उनकी शिक्षाओं से बने सात सिद्धांत इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह आज भी इस जगत को एक छोर से दूसरे छोर तक जोड़े हुए हैं। आस्था किसी के भी प्रति हो, किसी की भी हो, हर किसी का सम्मान हो। जाति प्रथा, छुआछूत जैसी बुराइयां न हों। सबको बराबरी का अधिकार मिले। इसका वो पुरजोर समर्थन करते हैं। उन्होंने हर मानव में भगवान को देखा। उन्होंने कहा था- बेहवे देगल। अर्थात यह शरीर एक मंदिर है, जिसमें आत्मा ही भगवान है। वूमैन इंपावरमेंट, इक्वल पार्टनरशिप, सिर्फ कहा नहीं, व्यवस्था साकार की। समाज के हर वर्ग से आई महिलाएं अपने विचार व्यक्त करती थीं। हमारे लिए यह बहुत ही गौरव का विषय है कि भारत की धरती पर आठ सौ वर्ष पहले इन विचारों को भगवान बसवेश्वर ने जनभावनाओं और जनतंत्र का आधार बनाया।"

 

अमित शाह ने कर्नाटक में दी बसवेश्वर को श्रद्धांजलि

- इससे पहले कर्नाटक दौरे पर पहुंचे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी बुधवार को बेंगलुरु में संत बसवेश्वर को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी। संत बसेश्वर की जयंती वैशाख महीने के तीसरे दिन पड़ती है। 

 

कर्नाटक में कितने असरदार हैं लिंगायत?

- इस समुदाय के वोटरों का 100 विधानसभा सीटों पर असर है। कर्नाटक विधानसभा में 224 में से 52 विधायक इसी समुदाय से हैं।
- कर्नाटक में 400 से ज्यादा मठ लिंगायतों के हैं। 

- कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अमित शाह दोनों ही अपने चुनावी दौरा में लिंगायतों के मठ में जा चुके हैं। 

- बता दें कि कर्नाटक सरकार ने लिंगायत समुदाय को राज्य में धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित किया है। हालांकि, इस पर अभी केंद्र की अंतिम मुहर नहीं लगी है। 

 

कर्नाटक सरकार ने लिंगायत को दिया अलग धर्म का दर्जा, राज्य की 100 सीटों पर डालते हैं असर

 

बदलता रहा लिंगायतों का रुझान
- 1980 के दशक में लिंगायतों ने राज्य में तब जनता दल के नेता रामकृष्ण हेगड़े पर भरोसा जताया था। बाद में यह समुदाय कांग्रेस के वीरेंद्र पाटिल के साथ आया। 1989 में कांग्रेस की सरकार बनी। पाटिल मुख्यमंत्री चुने गए, लेकिन राजीव गांधी ने उन्हें इस पद से हटा दिया था। इसके बाद लिंगायत फिर से हेगड़े के सपोर्ट में आ गए। 2004 में हेगड़े की मौत के बाद लिंगायतों ने बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा को अपना नेता चुना। जब बीजेपी ने 2011 में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाया तो इस समुदाय ने बीजेपी से दूरी बना ली।

 

कौन हैं लिंगायत?
- 800 साल पहले गुरु बासवन्ना ‘बसवेश्वर’ नाम के समाज सुधारक थे। उन्होंने जाति व्यवस्था में भेदभाव के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था।
- जानकार मानते हैं कि बासवन्ना के विचारों को मानने वाले ही लिंगायत और वीरशैव हैं।
- हालांकि, लिंगायत खुद को वीरशैव से अलग बताते हैं। उनका कहना है कि वीरशैव बासवन्ना से भी पहले से हैं। वे शिव को मानते हैं, जबकि लिंगायत शिव को नहीं मानते।
- लिंगायत अपने शरीर पर गेंद की तरह एक इष्टलिंग बांधते हैं। उनका मानना है कि इससे मन की चेतना जागती है।
- कर्नाटक में लिंगायत वोटर 17% हैं। वे करीब 100 विधानसभा सीटों पर असर डालते हैं। 224 में से 52 विधायक इसी समुदाय से हैं।

 

मोदी ने ही किया था मूर्ति का अनावरण

- नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2015 में अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान संत बसवेश्वर की इस मूर्ति का अनावरण किया था।

- इस मूर्ति की स्थापना का सबसे पहले विचार कर्नाटक के कलबुर्गी के रहने वाले एनआरआई डॉ. नीरज पाटील ने के मन में 2011 में आया था। पाटील लंदन के पूर्व मेयर भी रहे हैं।

 

 

 

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