--Advertisement--

जब भगवान विष्णु को एक ही परिवार के लिए लेना पड़ा तीन बार अवतार

भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु के बेटे प्रहलाद की रक्षा के लिए आधे शेर और आधे इंसान के रुप में अवतार लिया था।

Danik Bhaskar | Apr 26, 2018, 05:38 PM IST

रिलिजन डेस्क. 28 अप्रैल को भगवनाम नृसिंह का जन्मोत्सव है। भगवान विष्णु ने हिरण्यकशिपु के बेटे प्रहलाद की रक्षा के लिए आधे शेर और आधे इंसान के रुप में अवतार लिया था। ऐसा नहीं है कि भगवान विष्णु ने सिर्फ प्रहलाद की रक्षा या हिरण्यकशिपु के वध के लिए ही अवतार लिया। इसी परिवार के तीन सदस्यों के लिए भगवान को तीन बार अलग-अलग रुप में अवतार लेना पड़ा। ये कथा श्रीमद् भागवत की है। इसमें बताया गया है कि तीन बार भगवान विष्णु को अलग-अलग रुपों में एक ही परिवार के लिए आना पड़ा।

भक्त प्रहलाद के ही परिवार के सदस्यों के लिए तीन बार भगवार को धरती पर आना पड़ा। पहली बार हिरण्याक्ष को मारने और पृथ्वी को बचाने के लिए, दूसरी बार हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु को मारने और उसके बेटे प्रहलाद को बचाने के लिए और तीसरी बार प्रहलाद के पोते राजा बलि को बांधने के लिए वामन रुप में। ये कथाएं आज भले ही लोगों को काल्पनिक या सत्य से परे लगती हों लेकिन इनमें जीवन के कई सूत्र हैं।

पहला अवतार वराह के रुप में

श्रीमद् भागवत महापुराण में कहानी है कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नाम के दो दैत्य थे। इनमें से बड़े भाई हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर बहुत सा बल हासिल कर लिया था। इसके बाद उसने देवताओं को और समस्त मानव जाति को जीत कर धरती पर कब्जा कर लिया था। हिरण्याक्ष ये जानता था कि जहां गंदगी हो वहां देवता नहीं आते, इसलिए उसने सारी धरती पर भारी गंदगी फैला दी। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की तो उन्होंने वराह (सुअर) के रुप में अवतार लिया। उन्होंने धरती की सारी गंदगी को हटाया और हिरण्याक्ष को मार दिया। ये कहानी बताती है कि जो गंदगी फैलाता है वो भी राक्षस ही है। अगर देवताओं की कृपा चाहिए तो हमें सफाई का ध्यान रखना होगा।

दूसरा अवतार नृसिंह

हिरण्याक्ष के मरने के बाद उसका राज छोटे भाई हिरण्यकशिपु ने संभाला। उसने भी भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांगा लेकिन ब्रह्मा ने कहा कि जो जन्म लेता है उसे मरना ही होता है। तब उसने वरदान लिया कि वो ना घर के अंदर मारा जा सके, ना घर के बाहर, ना दिन में मारा जा सके ना रात में, ना उसको कोई मानव शरीर मार सके ना ही कोई जानवर, वो किसी शस्त्र या अस्त्र से भी ना मारा जा सके, ना आसमान में मारा जा सके और ना धरती पर। ब्रह्मा ने ये वरदान दे दिया। इसके बाद हिरण्यकशिपु ने आतंक मचाना शुरू कर दिया। लेकिन उसका बेटा प्रहलाद हुआ जो विष्णु का भक्त था। अपने बेटे के मन से विष्णु की भक्ति को मिटाने के लिए हिरण्यकशिपु ने कई कोशिशें की लेकिन वो सफल ना हो सका। ऐसे में एक जलते हुए खंभे से उसको बांधकर मारने का आदेश दिया, उसी खंभे से भगवान विष्णु नृसिंह के रुप में प्रकट हुए। जो आधे शेर और आधे मानव थे। उन्होंने शाम के समय में हिरण्यकशिपु को महल की दहलीज पर अपनी गोद में लिटाकर नाखूनों से उसका सीना चीर दिया। इस तरह ब्रह्मा के वरदान की हर बात सत्य साबित की। ना घर के अंदर मारा, ना बाहर, ना आसमान में और ना जमीन पर, बिना अस्त्र या शस्त्र के, ना दिन में और ना रात में।

 

 

 

तीसरा अवतार वामन

इसी प्रहलाद का पोता था राजा बलि। जो बहुत शक्तिशाली भी था और दैत्यों का राजा भी। बलि ने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। जिसके पूरे होते ही वो धरती और स्वर्ग का राजा हो सकता था। उस समय देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। तब भगवान विष्णु ने वामन (बोने) का रुप लिया। वो रुप इतना सुंदर था कि राजा बलि उससे प्रभावित हो गया। उसने वामन से दान मांगने को कहा। बलि को गुरु शुक्राचार्य ने समझाया कि ये विष्णु की माया है लेकिन वो नहीं माना। उसने दान देने का वचन दे दिया। वामन ने तीन पग भूमि मांगी, बलि ने हंसते-हंसते उसको स्वीकार कर लिया। वामन ने एक पैर में धरती, दूसरे में आकाश नाप लिया, तीसरा पैर बलि के सिर पर रखकर उसे बांध लिया। इस तरह उसे धरती और स्वर्ग का राजा बनने से रोका।