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भगवान शिव के इस अवतार से नहीं जीत पाए थे नृसिंह, ये है पूरी कथा

भगवान नृसिंह के अवतार की कथा तो हम सभी जानते हैं, लेकिन इसके बाद की कथा का वर्णन लिंगपुराण में मिलता है।

Danik Bhaskar | Apr 27, 2018, 05:00 PM IST

रिलिजन डेस्क। 28 अप्रैल, शनिवार को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि पर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया था। इसलिए इस दिन नृसिंह जयंती का पर्व मनाया जाता है। भगवान नृसिंह के अवतार की कथा तो हम सभी जानते हैं, लेकिन इसके बाद की कथा का वर्णन लिंगपुराण में मिलता है। इस पूरी कथा व इससे जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट इस प्रकार है-


ऐसे हुआ था भगवान नृसिंह का क्रोध शांत
लिंगपुराण के अनुसार, हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंहावतार लिया था। नृसिंह भगवान जब प्रकट हुए तब सब भयभीत हो गए। हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भी जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवता शिवजी के पास पहुंचे। देवताओं को निर्भय करने के लिए शिवजी ने अपने अंश भैरवरूप वीरभद्र को आज्ञा दी कि भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि को शांत करो। वीरभद्र भगवान नृसिंह के पास पहुंचे तथा उनकी स्तुति की लेकिन, नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत नहीं हुई तो उनके बीच विवाद हो गया। अंतत: शिवकृपा से वीरभद्र का रूप अत्यंत भयंकर, व्यापक एवं विस्तृत हो गया। शरभरूप शिव अपनी पुंछ में नृसिंह को लपेटकर छाती में चोंच का प्रहार करते हुए ले उड़े। तब भगवान नृसिंह की क्रोधाग्नि शांत हुई। उन्होंने शरभावतार से क्षमा याचना कर अति विनम्र भाव से उनकी स्तुति की।


ये है शरभावतार से जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट

शरभावतार में भगवान शंकर का स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षी (ग्रंथों में वर्णित आठ पैरों वाला जंतु जो शेर से भी शक्तिशाली था) का था। भगवान शंकर का यह अवतार चपलता, शक्ति तथा बुद्धि का प्रतीक है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि यदि हम किसी बलशाली से युद्ध करने जा रहे हैं तो स्वयं को परिपक्व कर लें। तभी हमारी विजय सुनिश्चित होगी। शरभावतार के स्वरूप में विद्यमान मृग फुर्ती तथा शरभ पक्षी बुद्धि तथा शक्ति का परिचायक है। इस अवतार में भगवान शंकर ने नृसिंह भगवान की क्रोधाग्नि को शांत किया था।