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ज्ञान की गहराई में जाने से जीवन में नई राहें खुलती हैं- भास्कर मंडे पॉजीटिव

भारत की सांस्कृतिक विरासत से किसिंजर, हिलेरी क्लिंटन, बेनजीर जैसी शख्सियतों का परिचय कराया

Danik Bhaskar | Jul 09, 2018, 12:21 AM IST
नवीना जाफा सेंटर फॉर न्यू परस् नवीना जाफा सेंटर फॉर न्यू परस्
मेरी मां मनोरमा जाफा बाल साहित्यकार हैं। उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया है। पिताजी रक्षा मंत्रालय में सचिव रह चुके हैं। मेरे पिताजी संयुक्त राष्ट्र में काम करते थे और उनकी पोस्टिंग डोमिनिका (वेस्टइंडीज) में हुई थी। मेरे ननिहाल में संगीत-गीत-नृत्य आदि का बहुत रिवाज था। नाना के यहां एक नवाब अली साहब आते थे, जिन्होंने मेरी मां, मौसी आदि को गायन सिखाया। उनसे गायन सीखा। इसी तरह गंगा प्रसाद से मैंने तबला सीखा। एक रतन लालजी थे जिनसे मैंने डान्स सिखा। फिर मेरी नानी मुझे आर्य समाज मंदिर ले जातीं और वहां पाणिनी की अष्टाध्याई कंठस्थ करवाती थीं। कालिदास और वेदों का ज्ञान करवाती थी। पिताजी बाहर से स्वदेश लौटने के बाद मैं दिल्ली लौटीं। पिताजी कार सरकारी कामों के लिए इस्तेमाल करते थे। इसलिए मां मुझे बसों में आर्ट एग्जीबिशन, डांस ये सारी चीजें दिखाने-समझाने ले जाया करती थीं। एक बार बिरजू महाराज का बैले हो रहा था ‘रूपमती और बाज बहादुर’। मुझ पर जो जैसे जादू चल गया कहा कि मैं कथक सीखकर रहूंगी। कहां तो मैं विदेश में, कॉन्वेंट में पढ़ी और कहां बिरजू महाराज के यहां कथक का परम्परागत वातावरण। मैं साढ़े दस साल की उम्र में दो-दो बसें बदलकर डांस सीखने जाती थी। एक सरस्वती पूजन में कपिला वात्स्यायन आईं। मैं उनसे बहुत प्रभावित हुई। 11 साल की उम्र से उनकी गोद में बैठकर मैंने भारत को जाना है। कपिलाजी, बिरजू महाराज और भी कई मेरे गुरुजनों ने भारत के गीत-संगीत और संस्कृति से मेरा परिचय कराया। मैंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डायरेक्टर डॉ. एमएन देशपांडे से अजंता-एलोरा की पढ़ाई की। एक और विद्वान पुरात्वविद थे, जिनसे मैंने खजुराहो की पढ़ाई की। फिर मैंने आर्ट-कल्चर पर साप्ताहिक क्लासेस लेनी शुरू की। मेरा सौभाग्य था कि मुझे उन कक्षाओं के लिए डिप्लोमेट मिले। फिर वे लोग कहने लगे कि हमको यह सब उन जगहों पर ले जाकर क्यों नहीं बतातीं और इस तरह आर्ट टूरिज्म का मेरा व्यवसाय शुरू हुआ। मैंने ‘परफॉर्मिंग हेरिटेज : आर्ट ऑफ एग्जीबिट वॉक्स’। यह किताब दुनिया में आर्ट टूरिज्म की गाइड मानी जाती है। मेरा इतने सारे डिप्लोमेट से परिचय हो गया कि उनके देश से बड़े अतिथि आते तो वे मुझे बुलाते कि आप ही उनका भारत से परिचय कराइए। बेनजीर भुट्टो, हेनरी किसिंजर, हिलेरी क्लिंटन, कोंडालीजा राइस जैसे लोगों को मैंने भारत से परिचय कराया है। बेनजीर लीडरशिप समिट में आने वाली थीं। मुझसे कहा गया कि मैं उन्हें हजरत निजामुद्दीन की दरगाह पर ले जाऊं। मैं ख्वाजा हसन निजामी सानी साहब के पास गई। उन्होंने कहा कि तुम उन्हें यहां ले आओ मैं उन्हें ऐसी चीज दिखाना चाहता हूं, जो उनके लिए ही हैं। बेनजीर ने डायमंड क्लस्टर की बहुत ही सुंदर अंगूठी पहनी हुई थीं। पहले वे पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के यहां जाना चाहती थीं। उसके बाद ख्वाजा साहब के यहां रवाना हुए। रास्ते में उन्होंने कहा कि अंगूठी तो गुजराल साहब के यहां वॉशरूम में रह गई। खैर वापस लौटे। अंगूठी ली। चूंकि बेनजीर आधिकारिक मेहमान नहीं थीं तो सुरक्षा सादे कपड़ों में थी। लौटने में रास्ता बदल गया। वे कहने लगीं कि तुम मुझे कहां ले जा रही हो। मैंने उन्हें बताया कि हम ख्वाजा साहब के यहां जा रहे हैं। फिर उन्होंने कहा, ‘मुझे दिन रात मेरी मौत का ख्याल आता रहता है इसलिए मैं वर्दी वालों को नहीं देखती तो बहुत घबराहट होती है। गाड़ी मोड़ो।’ फिर हम ख्वाजा साहब के यहां नहीं गए। दरगाह में ख्वाजा मूसा साहब थे। उन्होंने बेनजीर को पुराने एलबम में उनके परिवार के लोगों की तस्वीरें दिखाईं। इस बीच करीब सात-आठ बार बेनजीर ने दो प्रश्न पूछे कि वे वतन कब लौटेंगी और ताज़ कब पहनेंगी। मूसा साहब ने कहा, तीन साल दस दिन बाद तुम वतन लौटोगी। उसके बाद जब मैं उन्हें होटल छोड़ने गई तो उन्होंने पूछा अब तो बता दो ख्वाजा साहब क्या तोहफा देने वाले थे। मैंने कहा वे आपको आपके पिताजी द्वारा फांसी से पहले लिखा पत्र दिखाना चाहते थे। कहने लगीं, ‘पता नहीं मेरी किस्मत है भी या नहीं यह सब लेने की।’ मैंने ख्वाजा साहब के पास जाकर माफी मांगी। वे बोले, ‘बिटिया तुम क्यों माफी मांग रही हो। जिसकी किस्मत में होता है उसे ही बुलाया जाता है।’ तीन साल बाद वे पाकिस्तान लौटीं तो मैं मूसा साहब से मिली और ख्वाजा साहब से भी। ख्वाजा साहब ने कहा आपने देखा वे लौंटी हैं। मैंने कहां जी हां। वे हवाई जहाज से उतरीं, जमीन को छुआ और हाथ की अंजुरी बनाकर आसमान में ऊपर देखा। उन्होंने कहा, ‘देखा न ऊपर। वो है वतन। अभी उनकी आमद हुई कहा हैं।’ यानी वे लौटीं कहां हैं? दस दिन बाद बेनजीर की हत्या हो गई। ठीक तीन साल दस दिन बाद। वहीं ऊपर आसमान में था उनका वतन। न्यूयार्क में जब 9/11 का हमला हुआ तो उसके कुछ दिनों बाद मुझे संदेश मिला कि एक हाई लेवल डेलिगेशन अमेरिका से आ रहा है। उन्हें इस्लामिक आइडियोलॉजी पर आपको कुछ बताना है। आने के कुछ पहले मुझे बताया गया कि वह शख्सियत हैं हेनरी किसिंजर। वे भी दरगाह जाना चाहते थे। मैंने ख्वाजा साहब को बताया तो उन्होंने कहा, ‘तो यहुदियों के बादशाह को ला रही हो।’ खैर उन्होंने किसिंजर के स्वागत में चंदन का हार मंगवाया, सूखे मेवो का इंतजाम किया। लेकिन, जब किसिंजर की कार दरगाह की पार्किंग में पहुंची तो पत्थर जैसे बड़े-बड़े ओले गिरने लगे और गिरते ही चले गए। किंसिजर को कार से बाहर निकले बगैर लौटना पड़ा। बाद में ख्वाजा साहब से मिली और कहां कि आज मैं बहुत दुखी हूं तो उन्होंने कहा, ‘राजाओं के यहां जाओगी तो बेचैनी मिलेगी, फकीरों के यहां आओगी तो सुकून मिलेगा। न्योता नहीं था इसलिए किसिंजर नहीं आ पाए।’ (जैसा उन्होंने अानंद देशमुख को बताया)