--Advertisement--

दल-बदल के खिलाफ कड़े उपायों की जरूरत

संदर्भ: वक्त रहते चुनाव सुधार नहीं हुए तो तेजी से फैलती निराशा जेपी आंदोलन जैसी क्रांति में बदल सकती है

Danik Bhaskar | Jul 13, 2018, 11:04 PM IST
विमल सिंह, राजनीतिक विश्लेषक औ विमल सिंह, राजनीतिक विश्लेषक औ

हमारे देश में अब एक राजनीतिक परिपाटी ही बन गई है। हर राजनीतिक दल, दल-बदलुओं का बाहें पसारकर स्वागत कर रहा है। इसमें वे दल सबसे आगे हैं, जो सत्ता में हैं। कल तक सत्तारूढ़ दल को घोर साम्प्रदायिक, देश-विरोधी और अमर्यादित बताने वाला कोई नेता दूसरी सुबह उसी दल के मंच पर उसी का झंडा थामे उसके गुणगान करता नज़र आता है। वह कहता है कि मैं तो सदा से इसी दल का समर्थक था, मजबूरी में दूसरे दल में पड़ा था। यह वास्तव में मेरी घर वापसी है। उसके समर्थक उसके नारे लगाते हैं और जनता हैरत से देखती रहती है।


क्या ऐसा करके राजनीतिक दल और उनके नेता हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल मंत्र और चुनाव-व्यवस्था और संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ नहीं करते? राजनीतिक दलों और नेताओं को लगता है कि कोई फर्क ही नहीं पड़ता। इसमें वे कुछ गलत, अनैतिक देखते ही नहीं। आखिर इसे क्यों उचित माना जाता है? यह उचित इसलिए नहीं है कि दल विशिष्ट राजनीितक विचारधारा के आधार पर बनते हैं। चुनाव होते हैं तो जनता राजनीतिक दलों को अपना मत सोच-विचार कर देती है। किसी प्रत्याशी को वोट देने या न देने के लिए उसके पास कुछ कारण होते हैं। जनता के लिए यह एक मौका होता है, जब वह दलों एवं नेताओं के काम-काज का, उनकी उपलब्धियों का और उनके वादे पूरे करने की सच्चाई का मूल्यांकन करती है। जनता के लोगों के पास वोट के रूप में एक ऐसा शस्त्र है, जिससे वह अपने प्रतिनिधि को बदल सकती है, एक पार्टी को हराकर दूसरी को जिता सकती है। अगर उनका प्रतिनिधि उनके लिए उपादेय नहीं होता तो वह उसे अस्वीकार कर सकती है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है लोकतांत्रिक व्यवस्था में।

एक पार्टी से चुनाव जीतकर दूसरे दल में जाने वाला दल-बदलू जनता के इस हथियार को बेकार करने का अपराध करता है। जो राजनीतिक दल उसे स्वीकार करते हैं वे संविधान की मूल भावना को पराजित करते का काम करते हैं। किसी को भी यह अनुमति नहीं हो सकती कि वह जनता की उस शक्ति को छीन ले, जो उन्हें संविधान ने प्रदान की है। जब एक वोटर मतदान केंद्र पर होता है तब अपना वोट देते समय वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है, इस शक्ति का प्रयोग वह अपनी उम्मीदों को ध्यान में रखकर करता है। कई बार वह विचारधारा को भी ध्यान में रखता है।

दल-बदलुओं को अपना मंच देकर राजनीतिक दल आम आदमी के मन में निराशा पैदा करते हैं। दल-बदल की प्रवृत्ति राजनीतिक चकाचौंध के वर्तमान माहौल में पिछले तीन दशक से काफी तेजी से बढ़ती आई है। ईमानदार, अच्छी सोच वाले दूरदर्शी नेता लुप्त होते जा रहे हैं। राजनीति आज के दौर में बाहुबल और धन से प्रभावित ही नहीं हो रही, उसी का वर्चस्व है। राजनीति अब पूर्णकालिक रोजगार बन गया है। पहले राजनीति देश की सेवा के लिए की जाती थी, अब देश राजनेताओं की सेवा में रहता है। यह बहुत कटु और दुर्भाग्यपूर्ण बात है, लेकिन सत्य है। ऐसा नहीं होता क्यों कोई नेता बिना विचार और सिद्धांत के किसी भी पार्टी में चला जाता? आज देशभर में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो हर उस पार्टी में शामिल हो जाते हैं जो सत्ता में हो। कई ऐसे नेता हैं, जो हर पार्टी की सरकार में मंत्री बन जाते हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें विपक्ष की राजनीति करनी ही नहीं, हमेशा सत्ता पक्ष में ही रहना है। जबकि विपक्षी राजनीति जीवंत लोकतंत्र का अपरिहार्य अंग है।

यह भी कटु सत्य है कि आज बहुत सारे नेता जन सेवा के बहाने तरह-तरह के कारोबार में लिप्त हैं। ऐसा भी नहीं है कि उनके सारे व्यापार नियमानुकूल और साफ-सुथरे हैं। अवैध-धंधों और नियम-विरुद्ध काम करने के लिए कई नेता कुख्यात है। वे कानून की पकड़ से बचने के लिए हर समय सत्ता पक्ष में रहना चाहते हैं। इसीलिए जो दल सत्ता में आए, उसके साथ हो जाते हैं। इस एकाधिकारवादी व्यापार-व्यवसाय का हमारी अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। आज हर राजनीतिक दल को जरूरत है आत्ममंथन करने की और दल-बदल करने वालों के बारे में सोचने की। सबको एक साथ बैठकर इसके बारे में एक बड़ा कदम उठाकर इस धोखे के खेल को रोकना चाहिए। अब पानी सिर के ऊपर से निकल रहा है। इसलिए हर राजनीतिज्ञ को इसके बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए।

दल-बदल कानून कई वर्ष पहले बन गया था लेकिन, उससे बचने का रास्ता भी ऐसे लोगों ने निकाल लिया है। अब सबको एक साथ बैठकर एक कानून उन लोगों के लिए बनाना चाहिए, जो बीच में ही दल-बदल करते हैं, जो भी अपनी मूल पार्टी को छोड़कर दूसरे दल में जाना चाहता है उसे कम से कम एक से दो वर्ष बिना किसी राजनीतिक पार्टी में जाए बैठना चाहिए। तत्पश्चात इनको नए दल में जाने के लिए इजाजत मिलनी चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया को एक कानून बनाकर संसद के दोनों सदनों से पास करा लेना चाहिए। भाजपा को जो कि वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी है, इस बारे में पहला कदम देशहित को ध्यान में रखते हुए उठाना चाहिए। न केवल आम जनता से बल्कि समाज के हर वर्ग के लोगों और सारे राजनीतिक दल इसका स्वागत करेंगे। हिन्दुस्तान की राजनीति में यह एक नए युग की और सुशासन (गुड गवर्नेन्स) की शुरुआत होगी। राजनीतिज्ञ अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता के प्रति उत्तरदायी होने के लिए बाध्य हो जाएंगे। यह कदम जाति के आधार पर मतदान को भी खत्म करने की तरफ एक जाएगा। कुल-मिलाकर यह पूरे हिन्दुस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया को आज़ादी के बाद दुरूस्त करने की शुरूआत होगी।

अगर सारे राजनीतिक दल आने वाले समय में सही कदम नहीं उठाएंगे तो देश एक बहुत बड़े फ्रस्ट्रेशन के माहौल की तरफ बढ़ रहा है। देश के युवाओं में बेरोजगारी को लेकर अंदर ही अंदर एक जनभावना बहुत तेजी से फैल रही है। आने वाले समय में यह एक बहुत बड़ी क्रांति के रूप में जैसे जेपी आंदोलन था, उससे भी बड़े रूप में परिवर्तित हो सकता है। (लेखक के अपने विचार हैं।)