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न्यूरोलॉजिकल रोगों से जुड़े 5 मिथक, इलाज में आती है प्रॉब्लम

3 वर्ष पहले
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हेल्थ डेस्क। एक अनुमान के अनुसार भारत में तकरीबन 30 मिलियन लोग किसी न किसी तरह के न्यूरोलॉजिकल रोग से पीड़ित हैं। आंकड़ों की बात करें तो 1,00,000 की आबादी में 2,394 मरीज़ इन रोगों का शिकार हैं। फिर भी इन रोगों के बारे में जागरुकता की कमी है और इन मरीज़ों को समाज में भेदभाव और कलंक का सामना करना पड़ता है। 

 

जागरुकता और सूझबूझ की कमी के चलते इन रोगों के साथ कई गलत मिथ भी जुड़े हैं, जिनका बुरा असर मरीज़ के जीवन पर  पड़ता है। इन गलतफहमियों की वजह से इलाज में रुकावट आती है और कई बार मरीज़ की हाल बेहद गंभीर हो जाती है। 

 

हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार 1990 और 2015 के बीच दुनिया भर में न्यूरोलॉजिकल रोगों के कारण होने वाली मौतों की संख्या 36.7 फीसदी तक बढ़ गई है। 2015 में ग्लोबल बर्डन ऑफ डीज़ीज़ प्रोजेक्ट द्वारा द लांसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार न्यूरोलॉजिकल रोग दुनिया भर में होने वाली 16.8 फीसदी मौतों का कारण हैं। इन रोगों के बारे में फैली गलत अवधारणाओं को दूर करने और लोगों को जगरुक बनाने के लिए विश्व पार्किन्सन्स दिवस के मौके पर डॉ. विनीत सूरी, सीनियर कन्सलटेन्ट, इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स ने इन रोगों से जुड़े पांच मिथकों के बारे में बताया :

 

1.पागलपन का मिथक :

यह न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जुड़ा सबसे आम मिथक है। जानकारी न होने के कारण अक्सर लोग अल्जाइमर से पीड़ित मरीज़ों को ‘कमज़ोर/दुर्बल’ तथा एपीलेप्सी के मरीज़ों को ‘पागल’ समझते हैं और अक्सर इन मरीज़ों को पागलपन के इलाज के लिए साइकेट्रिस्ट यानि मनोचिकित्सक के पास भेज दिया जाता है। 

 

2.कमजोर दिमाग का मिथक :

आमतौर पर लोग समझते हैं कि न्यूरोलॉजिकल बीमारी से पीड़ित मरीज़ों का दिमाग कमज़ोर होता है। यह भी एक मिथक है कि एपीलेप्सी/ मिर्गी या पार्किन्सन्स से पीड़ित मरीज़ का आईक्यू सामान्य व्यक्ति से कम होता है। यहां तक कि एपीलेप्सी से पीड़ित बच्चों का इलाज व्यस्कों की तरह किया जाता है।

 

3.अंधविश्वास का मिथक :

भारत में निरक्षरता की दर बहुत अधिक है। ऐसे में देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में अंधविश्वास बड़ी आसानी से फैलता है। कई बार मिर्गी जैसे रोगों को जादू-टोना का नाम दिया जाता है और अनपढ़ लोग इनके इलाज के लिए बाबाओं के जाल में फंस जाते हैं। जागरुकता और शिक्षा की कमी के चलते कई बार इन मरीज़ों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। 

 

4.इलाज का मिथक :

बीमारी चाहे कोई भी हो, लोगों को लगता है कि न्यूरोलॉजिकल बीमारी ठीक नहीं हो सकती। यहां तक कि शहरी इलाकों में कुछ इसी तरह की अवधारणाएं प्रचलित हैं। कई बार जब मरीज़ को पता चलता है कि उसे न्यूरो-रोग है ते वह मान लेता है कि उसे जीवन भर इस बीमारी का सामना करना पड़ेगा और उसकी बीमारी का कोई इलाज नही है। चिकित्सा विज्ञान की तरक्की के कारण आज ऐसे कई इलाज/थेरेपियां हैं, जिनके द्वारा इन रोगों का इलाज किया जा सकता है, या कम से कम इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।

 

5. समाज में कलंक और भेदभाव के नजरिए से देखा जानाः

न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जुड़ी गलत अवधारणाओं के चलते मरीज़ को अक्सर भेदभाव और कलंक की दृष्टि से देखा जाता है। अक्सर ऐसे मामले देखने-सुनने में आते हैं जहां इन बीमारियों के चलते लोगों की शादी टूट जाती है या बच्चे वृद्धावस्था में अपने माता-पिता को छोड़ देते हैं, ताकि उन्हें इन मरीज़ों की देखभाल का बोझ न सहना पड़े। 

 

क्या करना चाहिए? 
न्यूरोलॉजिकल रोग का सामना करना अपने आप में एक संघर्ष है। ज़रूरी है कि समाज का सदस्य होने के नाते हम सामाजिक और भावनात्मक दृष्टि से इन मरीज़ों के लिए सहयोगात्मक माहौल बनाएं। अल्जाइमर, पार्किन्सन्स, एपीलेप्सी, स्ट्रोक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, डीमेन्शिया आदि के बारे में जागरुकता फैलाकर ही ऐसा सकारात्मक माहौल बनाया जा सकता है। हमें न केवल रेाग से जुड़ी गलत अवधारणाओं को दूर करना चाहिए बल्कि इन मरीज़ों की मदद भी करनी चाहिए। 
 

 

 

 

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