‘स्वार्थ से हटकर किया कर्म ही वास्तविक पूजा’
सिलवानी | श्रीधर्म का अर्थ कोई कर्म विशेष नहीं है अपितु आपके द्वारा संपन्न प्रत्येक वह कर्म धर्म है, जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर परहित की भावना से किया जाए। धर्म केवल मंदिर में संपन्न अनुष्ठान का नाम भर ही नहीं है अपितु किसी भूखे प्राणी या जीव के लिए यथायोग्य आहार का दान भी धर्म है। केवल अपने आराध्य पर दूध चढ़ाने से ही धर्म संपन्न नहीं हो जाता अपितु किसी प्यासे को पानी को पिलाकर भी धर्म का निर्वहन हो जाता है। ये प्रवचन नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने शिव कथा में दिए। इस कथा का अायाेजन सिद्ध बाब बालक नाथ मंदिर में 41वें वार्षिकाेत्सव के उपलक्ष्य में किया गया। अत: धर्म को अगर सरल शब्दों में कहें तो वह ये कि अपने कर्तव्य का पूर्ण निष्ठा, पूर्ण समर्पण व पूर्ण पवित्रता के साथ निर्वहन भी धर्म है।