‘इंसान अपने ही बनाए जाल में फंसता जा रहा है’
सिलवानी | स्वयं को सही समझने के अहंकार से बचें जब तक प्रकृति का ज्ञान नहीं होता, तब तक हम भौतिक संसाधनों के मिथ्या सुख में डूबे रहते हैं। प्रकृति को भूलकर मैं-मेरा करते हुए सांसारिक बंधनों में हम डूबते चले जाते हैं। माया के कारण हम इतने अंधे हो जाते हैं कि भागने का रास्ता होने पर भी हम जाल से भाग नहीं पाते हैं। इस बात को समझने के लिए हम मछलियों व रेशम के कीड़े के जीवन को देख सकते हैं। जाल में से निकलने की राह खुली है, फिर भी मछली भाग नहीं सकती। रेशम का कीड़ा अपनी ही लार से कोश बनाकर उसमें फंसकर अपनी जान गंवा देता है। ये प्रवचन मुनि विनय कुमार अालाेक ने अणुव्रत भवन सेक्टर 24 में दिए। अक्सर मनुष्य इस अहंकार में जीता रहता है कि वह जो कुछ कर रहा है, वह सही है।