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अगर थिएटर में पैसा होता तो मैं अभी भी यही कर रहा होता

एक वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर | चंडीगढ़

अगर उस दिन मेरे दाेस्त विजय जोशी ने मुझे पीछे से धक्का देकर स्टाफ रूम, जहां यूथ फेस्टिवल के लिए सिलेक्शन हो रहा था ना भेजा होता ताे शायद मैं आज इस मुकाम पर नहीं होता। उस दिन चंडीगढ़ से आए डायरेक्टर रवि चौहान ने कालका के गवर्नमेंट कॉलेज से मुझे नाटक के मेन रोल के लिए चुना। बस वहां से जो गाड़ी चली वो आज तक नहीं थमी। यह बताया मशहूर एक्टर पंकज बेरी ने। वह हाल ही में चंडीगढ़ में थे। इस दौरान हमने उनसे एक्टिंग के सफर को लेकर बात की। कालका में पले बड़े पंकज 1985 में पंजाब यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ इंडियन थिएटर के पहले गोल्ड मैडलिस्ट हैं। उन्हाेंने बताया- मोहन महर्षि, कुमार वर्मा, महेंद्र, रानी बलबीर कौर, नीलम मानसिंह चौधरी जैसे दिग्गज कलाकारों को मैंने गुरु के रूप में पाया। बलवंत गार्गी के साथ मैंने तीन शो किए - सांझा चूल्हा, बुआ फातिमा, पंचतंत्र की कहानियां। यूं समझ लो पंजाब यूनिवर्सिटी में मेरे रंगमंच की नींव रखी गई।

थिएटर आपकी जिंदगी में कितना अहम? इस पर बाेले- जाे थिएटर से जुड़ता है, फिर वो उससे कभी अलग नहीं हाे सकता। मुझे अभी वक्त नहीं मिल पाता कि मैं रंगमंच कर पाऊं, लेकिन जब भी मौका मिलेगा, मैं मानव कौल का लिखा नाटक द पार्क जरूर करूंगा। अगर थिएटर में पैसा होता तो अभी भी यही कर रहा होता।

चंडीगढ़ से मुंबई के सफर को लेकर कहा कि किरण खेर मेरे दो नाटक मत्त विलासम, जिसमें मैंने कपाली का मेन किरदार निभाया और नाटक घासी राम कोतवाल जिसमें मैं घासी राम बना देखकर बोलीं कि आप यहां क्या कर रहें हैं। आप मुंबई के लिए बने हैं। फिर मैं 1500 रुपए के साथ अपने टैलेंट कि टोकरी उठाए मुंबई पहुंच गया।

मुझे टेड़े-मेड़े रोल ज्यादा पसंद हैं

इस मुकाम पर पहुंचने के बाद क्या आप अपने मुताबिक किरदार पसंद करते हैं? अगर किरदार मेरी पसंद का ना होता तो मैं जरूर अपनी एक राय रखता, लेकिन मेरी किस्मत ऐसी रही कि आज तक जो भी किरदार किए वो मेरे पसंदीदा ही रहे। मुझे टेड़े-मेड़े रोल पसंद हैं, वही किए भी हैं। किरदार में ढलने के लिए डेडीकेशन, डिसिप्लिन, डिवोशन, टाइम चाहिए। अगर एक कलाकार खुद को किरदार में ढालने के लिए मेहनत ही नहीं करेगा तो मंच पर फिर कुछ और ही दिखाई देगा। दो-दो दिन की रिहर्सल को मैं नहीं मानता, कुछ बनने के लिए प्रैक्टिस करनी पड़ती है तब जाकर उस मंजिल के करीब पहुंचते हो।

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