आसान नहीं होता बॉलीवुड के गानों पर फ्लूट प्ले करना
सिटी रिपोर्टर | चंडीगढ़
मैंने कई बॉलीवुड फिल्मांे के लिए फ्लूट प्ले किया है। जैसे “जब वी मेट” का गाना “आओगे के जब तुम”, गदर व कल हो न हो अादि। लेकिन मैं ये समझता हूं कि फिल्मों में प्ले करने से म्यूजिशियन के लिए अलग से पहचान बनाना मुश्किल हो जाता है, म्यूजिक डायरेक्टर का ही नाम मेन होता है। अगर ऐसा न होता तो मुझे यह बताना न पड़ता कि मैंने फलां फिल्म के फलां गाने में फ्लूट प्ले किया था। कहने का मतलब है कि यह प्लेटफॉर्म सही है लेकिन अलग से पहचान बनानी है तो मंच पर परफॉर्म करने से ही बात बनेगी। तभी इसमें करिअर बना पाओगे। बॉलीवुड और लाइव शो में परफॉर्म करने पर अपने विचार इस तरह से रख रहे थे बांसुरी वादक उस्ताद मुज्तबा हुसैन। वह बुधवार को शहर में एक कार्यक्रम में परफॉर्म करने पहुंचे थे। 30 साल के करिअर में उन्होंने जो अनुभव किया वो सब हमें बताया। वे बोले- हालांकि बॉलीवुड के गानों में प्ले करना आसान काम नहीं होता है। मुज्तबा पटियाला में रहते हैं जब पंजाब में आने के बारे में उनसे पूछा गया तो बोले- मैं पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पढ़ाता हूं। 2006 से पंजाब आया और तब से लेकर अभी तक यहीं पर हूं। इससे पहले मुंबई में था।
मुज्तबा हुसैन अपने चाचा जी की बात साझा करते हुए बोले- चाचा जी ने पूरी जिंदगी एक ही बांसुरी रखी। वह बांसुरी खुद ही बनाया करते थे। नामी फ्लूट मेकर सुभाष ठाकुर ने चाचा से न केवल बांसुरी बजाना सीखा बल्कि बनाना भी सीखा। अब सुभाष जी की बनाई हुई बांसुरी नामी वादक बजाते है। वे दिल्ली रहते हैं। मैंने चाचा जी से सिर्फ बांसुरी बजाना सीखा। बनाने की ओर मेरा रुझान नहीं था।
सुनने वालों को नहीं लगता कि पहली बार साथ दे रहे हैं
लाइव परफॉर्मेंस को लेकर मुज्तबा बोले- कई बार जिस तबला वादक ने साथ देना होता है, उनसे पहली बार ही मुलाकात हो रही होती है। ऐसे में कई बार पहले से तैयारी हो भी जाती है और कई बार नहीं भी। जैसा एक बार यह हुआ कि परफॉर्मेंस से कुछ देर पहले ही तैयारी की कि श्रोताओं को क्या सुनाना है। लेकिन हमारी संगीत की खूबसूरती यही है कि सुनने वालों को नहीं लगेगा कि पहली बार एक दूसरे के साथ मंच साझा कर रहे हैं।
मुज्तबा हुसैन बोले- दादा उस्ताद मुंशी खान और पिता उस्ताद पीर बक्ख मशहूर शहनाई वादकों में से थे और चाचा जी नामी बांसुरी वादक में से एक थे। दोनों ही इंस्ट्रूमेंट से मुझे बेहद पंसद हैं। मैंने शहनाई बजाना सीखा भी और काफी समय तक शहनाई बजाई भी। लेकिन करिअर के तौर पर इसे लेकर आगे नहीं बढ़ा। क्योंकि रुझान था बांसुरी बजाने पर। जब भी इसकी मधुर धुन जब भी कानों पर पड़ती तो, उस धुन में खो जाता। ऐसा लगता मानो किसी दूसरी दुनिया में चला गया हूं। चाचा जी फहीमुल्लाह खान जब भी बांसुरी बजाते थे ऐसा ही महसूस होता था। इसी तरह से मेरा रुझान बांसुरी की ओर बढ़ता चला गया।
_photocaption_शहनाई से बांसुरी तक का सफर*photocaption*