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कुदरत, विरसा, इंसान काे उतारा कैनवास पर

एक वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर | चंडीगढ़

चंडीगढ़ को ना जाने कब से दिल के साथ आंखों में लेकर घूमता हूं। यहां के रंग और उनकी खूबसूरती को देखना ताे मेरे लिए ऐसे है जैसे तरसती जमीन पर पानी की बूंदें बरस कर ठंडक दे गई हो। इसको बनाने में एक हफ्ता लगा और मीडियम है एक्रेलिक। चंडीगढ़ के मौसमों को कैनवास पर उतारा है। मैं आर्टवर्क बनाता नहीं, बस खुद ही बन जाता है। दिमाग को चलाने की जरूरत नहीं पड़ती, अपने आप ही कैनवास को देखते ही पता लगने लगता है कि कहां पर काैन-सा रंग लगाना है। इसकी खासियत यह है कि मैंने इसके ब्रश इस्तेमाल नहीं किए। रोलर, स्पचुला आदि इस्तेमाल की हैं। मेरे यहां पर आठ आर्टवर्क लगे हैं। यह बाेले अार्टिस्ट

राजेंद्र कुमार। दरअसल सेक्टर-10 के गवर्नमेंट म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में सेकेंड एनुअल आर्ट एग्जिबीशन लगी हुई है। इसमें 13 आर्टिस्ट ने करीब 60 से ज्यादा आर्ट वर्क एग्जीबिट हैं। इसमें उनके साथ-साथ मयंक भोला, डॉक्टर अंजू बाला, राजेन्द्र कुमार, देव आनंद, मोनिका ग्रोवर, मोनिका राणा, अमनप्रीत कौर, ऋतु सिंह, आरती, रवि भादू, विनोद अरोड़ा, करमजीत सिंह आदि के अार्टवर्क डिस्प्ले हैं।

} राजेंद्र कुमार

_photocaption_मैं खुद को बादल ही मानता हूं*photocaption*

धरोहर को संजोने की इच्छा को किया पूरा

 मेरा मानना है कि जो हिस्टोरिकल साइट्स या काफी पुरानी बिल्डिंग्स हैं, उनको संजोकर रखने का काम सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि हम आर्टिस्ट्स का भी है। बस इसी सोच के साथ उन सारी धरोहरों को मैं अपने कैमरे में कैद करता जाता हूं। जो जैसा है उसे अपनी अांखाें अाैर कैमरे में उतार लेता हूं। यहां पर मेरे दो आर्टवर्क लगे हैं। एक में फतेहपुर बुर्ज, जोकि सिखों के इतिहास से ताल्लुक रखता है और दूसरे में पंजाब यूनिवर्सिटी के गांधी भवन को तस्वीरों में उतारा है। मैं वैसे फ्रेंच भाषा का स्टूडेंट हूं, लेकिन एक आर्टिस्ट भी हूं। 
- मयंक भोला, यंग आर्टिस्ट्स

आर्टवर्क को भी दिया जिंदगी के जैसे एडवेंचर

 जैसे सीधी-सीधी जिंदगी जीने में अच्छी नहीं लगती, वैसे ही सीधे-सीधे कैनवास मुझे सुकून नहीं देते। इसी सोच के साथ मैंने एक ही तस्वीर को छह अलग कैनवास पर उतारकर समेटा है। डांस करती हुई लड़की की तस्वीर को एक ही कैनवास पर उतारना मेरे लिए मुश्किल था। इसीलिए मैंने कैनवास को भी डांस करवा दिया। यहां पर मेरे तीन आर्टवर्क लगे हैं। जितने ज्यादा रंग मैं इस्तेमाल कर सका, मैंने किए हैं। अगर एक भी रंग जिंदगी से गायब हो तो कहीं ना कहीं कोई कमी रह ही जाएगी। बस इसी मकसद के साथ काफी सारे रंग इस्तेमाल किए हैं। 
- देव आनंद, टीचर

 1982 सेे मैंने आर्ट्स की पढ़ाई शुरू की, तभी से ना जाने कैसे बादल दिल में घर कर गए। तभी से बादलों को कैनवास पर उतारकर प्रकृति को दर्शाता हूं। कुदरत के पांच तत्वों को ह्यूमन फिगर के जरिए पेंट करता हूं। उसके बाद उसमें लाइन ड्रॉ करता हूं, जोकि मेरे अध्यात्म के साथ जुड़ी हुई हैं। इसको मैंने ऑयल मीडियम में बनाया है। इसे बनाने में चार से पांच महीने का समय लगता है। बादल मेरे लिए इसलिए खास है क्योंकि मैं खुद को बादल ही मानता हूं, जोकि हर दिन कुछ ना कुछ अपने अंदर भरता है। मैं कलात्मक तरीके से उसे जगजाहिर करता हूं। इस एग्जिबीशन में मेरे ग्यारह आर्टवर्क लगे हैं।। 
- सुभाष शौरी, टीचर

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