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होली पर वह भी रंगों से भीग जाते हैं जो घरों से नहीं निकलते

एक वर्ष पहले
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होली पर वह भी रंगों से भीग जाते हैं जो अपने घरों से नहीं निकलना चाहते और जैसे की भिगोने वालों का तकिया कलाम बन चुका होता है बुरा ना मानो होली है। कुछ लोग त्योहार का गलत फायदा उठा कर बहुत अधिक मादक पदार्थों का सेवन करते हैं और सड़क पर चल रहीं महिलाओं को परेशान करते हैं। यह सरासर गलत व्यवहार है। ये प्रवचन मुनि विनय कुमार अालाेक ने अणुव्रत भवन सेक्टर-24 में दिए।

अटूट विश्वास, प्रेम और सद्भाव का पर्व है होली। छोटे-बड़े, गरीब और अमीर सभी इस त्योहार पर भेदभाव मिटाकर रंग जाते हैं प्रेम के रंग में। दौर बदला तो लोगों में प्रतिस्पर्धा और अहम की लड़ाई जोर पकड़ने लगी। यह पर्व ऐसे भंवर में फंसा कि शहर, मुहल्ला और गली तो छोड़िए चार लोग मिलकर अपने-अपने घरों के बाहर ही होली सजाने में जुट गए। इसमें भी बहस इस बात की कि मेरी होली दूसरे से ऊंची ही हो। इस बेजा प्रतिस्पर्धा से न सिर्फ आपसी प्रेम वाले इस पर्व की अहमियत और सौहार्द खत्म हो रहा है, बल्कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के चलते पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है। आपसी दुश्मनी और मनमुटाव को दरकिनार कर प्यार के रंगों से सराबोर होने के पर्व होली पर क्यों न सब मिलकर एक मुहल्ले में एक ही होली’ जलाने का अनूठा संकल्प लें। इससे न सिर्फ आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ेगा बल्कि पर्यावरण को भी प्रदूषित होने से बचाया जा सकेगा।

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