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अर्थी-समर्थी को पूर्ण करने वाला ही वेदांत के रहस्य को समझ सकता: रसिक महाराज

एक वर्ष पहले
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सिद्ध बाबा बालकनाथ मन्दिर मलोया के 41वें वार्षिकोत्सव पर आयोजित पांच दिवसीय शिव कथा के दूसरे दिन नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने बताया कि अर्थी समर्थी इन दोनों शर्तों को पूर्ण करने वाला ही सचमुच में वेदांत के रहस्य को समझ सकता है। अर्थी का मतलब चाहना और समर्थी का मतलब साधन संपन्न होना। जैसे किसी को कश्मीर देखने की इच्छा तो हो परंतु पास में पैसे न हों तो नहीं जा सकेगा अथवा जिस प्रकार से किसी के पास में पैसे तो बहुत हैं परंतु कश्मीर देखने की इच्छा ही न हो तब भी नहीं जा सकेगा, ठीक इसी प्रकार से परमात्मा को जानने की इच्छा तो बहुत है परंतु साधन संपन्न नहीं है अर्थात् ब्रह्मचर्य अभ्यास वैराग्य आदि नहीं है या फिर कुछ लोगों में यह लक्षण प्रतीत भी होते है परंतु जन्म मरण के बंधन से छूटने की तड़पन ही नहीं है ऐसे दोनों प्रकार के व्यक्ति सचमुच में परमात्म तत्व को नही जान सकते।

परमात्मा तत्व को जानने के लिए तो अर्थी जन्म मरण के बंधन से मुक्त होने की तड़पन व समर्थी अर्थात विवेकवादी चतुष्टय साधन सम्पन्न हो विचार करने में सफल होंगे वरना करेंगे तो वेदांत विचार और मन पता नहीं कहां कहां पर विषय भोगों का रसास्वादन करेंगे।

मानव जीवन में जल का विशेष महत्व होता है

दण्डकारण्य तीर्थ का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि मां नर्मदा जी वैराग्य की अधिष्ठात्री मूर्तिमान स्वरूप है। गंगा जी ज्ञान की, यमुना जी भक्ति की, ब्रह्मपुत्रा तेज की, गोदावरी ऐश्वर्य की, कृष्णा कामना की और सरस्वती जी विवेक के प्रतिष्ठान के लिये संसार में आई हैं। सारा संसार इनकी निर्मलता और ओजस्विता व मांगलिक भाव के कारण आदर करता है व श्रद्धा से पूजन करता है। मानव जीवन में जल का विशेष महत्व होता है। यही महत्व जीवन को स्वार्थ, परमार्थ से जोड़ता है। प्रकृति और मानव का गहरा संबंध है। नर्मदा तटवासी माँ नर्मदा के करुणामय व वात्सल्य स्वरूप को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। बडी श्रद्धा से पैदल चलते हुए इनकी परिक्रमा करते हैं। कथा प्रारम्भ होने से पूर्व सिद्ध बाबा बालकनाथ मन्दिर मलोया के संस्थापक गुरु मामचंद राणा, नरेन्द्र वर्मा, सुभाष बंसल, संदीप सिंह, प्रताप सिंह, चमेली देवी, पूजा बंसल, अमर सिंह, वीर चन्द, अभिलाष सिंह ने माल्यार्पण कर व्यासपीठ का पूजन किया।
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