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श्रेष्ठ वही है जो चरित्र को मजबूत रखता है

एक वर्ष पहले
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जब लोग हमारे साथ अभद्रता करें तो हम उनकी प्रशंसा क्यों करें? इसका जवाब था कि प्रशंसा करना मेरा चरित्र है और अभद्रता करना उसका चरित्र। उसके चरित्र को मैं अपने चरित्र पर नहीं लाद सकता। हमें उनके साथ भी सभ्य बने रहना होगा, जो हमारे साथ सभ्य नही हैं। किसी के ओछे पन से अपने चरित्र को ओछे पन तक लाना तो बेवकूफी ही है। इतना तो मानना ही होगा कि क्रोध की प्रतिक्रिया में किया गया क्रोध, उससे भी बड़ा क्रोध है। बुराई की प्रतिक्रिया में की गई बुराई उससे भी बड़ी बुराई है। गलत की प्रतिक्रिया में किया गया गलत काम किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता। जीवन में दो नकारात्मकताएं मिलकर एक सकारात्मकता नहीं बन सकती। ये शब्द मनीषी संत मुनि श्री विनय कुमार आलोक ने अणुव्रत भवन सेक्टर-24 के तुलसी सभागार में कहे।

मनीषी संत ने आगे कहा श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठ वह है, जिसने अपना चरित्र हमेशा मजबूत रखा। जो बुराई से विचलित होकर डिगा नहीं। इसलिए कहा जाता है कि सदैव अपने चरित्र पर डटे रहो। एक दिन तुम्हारा चरित्र अवगुणों को भी बदल देगा। यह प्रक्रिया धीमी है, मगर पहले ही दिन से शुरू हो जाती है।

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