एसिड अटैक सर्वाइवर के संघर्ष के बारे में बताया
सिटी रिपोर्टर | चंडीगढ़
दिल है छोटा-सा छोटी-सी आशा, चांद तारों को छूने की आशा, आसमानों में उड़ने की आशा.....के बोलों के साथ एयर होस्टेस बनने के सपने को आंखों में भरकर इंटरव्यू के लिए जाते वक्त लड़की एसिड अटैक का शिकार हो जाती है। सब कुछ वहीं थम जाता है। पर वो हार नहीं मानती और आगे बढ़ती जाती है। लोग उसके चेहरे से डरते हैं, परिवार घर के बाहर जाने से रोकता है और समाज के तो ताने ही खत्म नहीं होते। इन सबके बावजूद वह हिम्मत जुटाती है और लोगों के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ आती है। बाकी एसिड अटैक सर्वाइवर को आगे बढ़ने का हौसला देती है। यह सब दिखाया नाटक पंख लगा के उड़ चलें में। यह वुमन डे के माैके पर अतुल्य प्रयास चेरिटेबल सोसायटी के सहयोग से थिएटर फॉर थिएटर ग्रुप की ओर से कम्युनिटी सेंटर, वसंत विहार, जीरकपुर में खेला गया। इसको लिखा व डायरेक्ट सौरभ शर्मा ने किया। इसको पब्लिक तक पहुंचाने का मेन मकसद एसिड अटैक सर्वाइवर के संघर्ष से रूबरू करवाना था। नाटक में एसिड अटैक के कारणों से हटकर अटैक के बाद की जिंदगी दिखाई गई। जिसको जीना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि समाज इसमें सबसे बड़ा रोड़ा बनता है। बहुत से ताने होते हैं जो सर्वाइवर को सुनने पड़ते हैं।
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
नाटक ने एसिड से जलती औरत के अलावा आए दिन घरों में जलती व कभी हवस के शिकार के बाद आग में झोंक दी जाती बेटियों पर भी ध्यान दिया किया। बताया गया कि सती प्रथा तब भी थी और आज भी। बस माध्यम बदल गया है। नाटक का अंत दुष्यंत कुमार की कविता-
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए, सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.... के साथ पॉजिटिविटी के साथ हुआ।
इन्होंने किया एक्ट|प्रियंका राजपूत, शुभम, मुकुल, निखिल, गगन, दीपक, आशीष, सौरभ व राजवीर ने नाटक में एक्ट किया।
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