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डाउनलोड करेंरायपुर। जिले के 180 सरकारी स्कूलों में 160 से ज्यादा स्कूलों में खेल मैदान ही नहीं है। फिर भी बच्चों से हर साल खेल शुल्क लिया जा रहा। खेल शुल्क के नाम पर शिक्षा विभाग ने पांच साल में 5 करोड़ रुपए की वसूली कर डाली। खास बात तो यह है कि ये सब तब है जबकि निजी स्कूलों को मान्यता देने के पहले खेल ग्रांउड चेक भी किया जाता है।
- खेल मैदान के नाम पर हर साल बच्चों से क्रीडा शुल्क लिया जा रहा है। हाईस्कूल के प्रति बच्चों से 50 रुपए और हायर सेकेंडरी स्कूल के बच्चों से 65 रुपए, लेकिन इन स्कूलों में खेल ग्राउंड ही नहीं है। शिक्षा विभाग के जिम्मेदार खेल ग्राउंड नहीं होने के बावजूद बिना सर्वे के ही सरकारी स्कूलों का निर्माण करा दिए। यहीं वजह है कि इन स्कूलों के स्टूडेंट्स किसी भी क्षेत्र में प्लेयर नहीं बन पा रहे है। इसी तरह हर साल क्रीडा शुल्क के नाम पर एक करोड़ 50 लाख रुपए शिक्षा विभाग डेढ़ लाख बच्चों से वसूल रहा है।
दूसरे स्कूलों में बांट रहे राशि
- शिक्षा विभाग का एक और कारनामा सामने आया है कि जिन स्कूलों में खेल ग्राउंड नहीं, वहीं के बच्चों से राशि वसूलने के बाद दूसरे स्कूलों को बांटी जा रही है। जबकि जिन स्कूलों में खेल मैदान ही नहीं है, उन स्कूलों का मेंटेनेंस नहीं कराया जाता। यहां तक कि कुछ मिट्टी वाले मैदान में पेवर ब्लॉक लगाकर मिट्टी को ढक दिया गया है। इस वजह से गर्मी के दिनों में सबसे ज्यादा पैदल चलने वाले बच्चों को धूप की वजह से दिक्कतें होती है।
जानिए, खेल मैदान क्यों जरूरी है
- तमाम तरह के खेल से बच्चे स्वास्थ्य रहते है। सीजनेबल खेल भी हर तीन महीने में कराना जरूरी होता है। इससे बच्चों के मानसिक विकास में वृद्धि होती है। वहीं बच्चे शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहते है। इसके अलावा तमाम खेल के संबंध में उन्हें जानकारी हो।
बड़ा सवाल? नियम निजी के लिए, सरकारी के लिए नहीं?
- निजी स्कूलों खोलने के लिए कई तरह के नियमों का पालन करना होता है। इसमें खेल ग्राउंड भी शामिल किए गए है। खेल ग्राउंड नहीं होने पर मान्यता नहीं दी जाती, लेकिन यहां सरकारी स्कूलों में हर साल एक करोड़ रुपए से अधिक की वसूली हो रही है। यहां तक कि जिम्मेदार किस मद के लिए राशि वसूल रहे है, यह भी सर्वे नहीं करते, जबकि कई सुविधाएं स्कूलों में नहीं मिलने के बावजूद राशि वसूल की जा रही है।
चार क्लास के स्टूडेंट्स से ले रहे शुल्क
- यह शुल्क 9 वीं से 12 वीं कक्षा के छात्र-छात्राओं से लिया जाता है। हाईस्कूल के स्टूडेंट्स से 50 रुपए लिए जा रहे है। वहीं हायर सेंकेड्री क्लास में पढ़ने वालों बच्चों से 65 रुपए शुल्क लिया जा रहा। इसी तरह सालाना एक करोड़ 5 लाख रुपए वसूल किया जा रहा है।
जिले के 90 फीसदी स्कूलों में खेल ग्राउंड नहीं
- आरडी तिवारी खोखो पारा पुरानी बस्ती : यहां पहले मिट्टी वाले मैदान थे। इसमें निर्माण किया गया है। साथ ही छोटे से हिस्से में पेवर ब्लॉक लगे हुए है। गर्मी के दिनों में पेवर ब्लॉक भी तप जाते है। यहां के बच्चों से भी क्रीड़ा शुल्क किया जा रहा है।
- डगनिया, हायर सेकेण्डरी : यहां भी कोई ग्राउंड नहीं है। छोटे से जगह ही बचे हुए है। इस वजह से बच्चे खेल भी नहीं पाते, जबकि हर साल यहां के बच्चों से खेल शुल्क किया जा रहा है। बच्चे यहां खेल भी नहीं पाते।
- रामसागरपारा बढ़ईपारा स्कूल : यहां पर भी मैदान नहीं है। सिर्फ क्लास रूम है। छोटा सा आंगन बना है। वहां पर पेड़-पौधे लगे है, लेकिन बच्चे इस जगह में खेल नहीं सकते, जबकि क्रीड़ा शुल्क के नाम पर हजारों रुपए स्कूल वसूलता है।
डीईओ को पत्र लिखना चाहिए
स्कूल बनाने और खेल मैदान तैयार करने के लिए नगर निगम और जिला पंचायत से जगह मांगनी चाहिए। इस संबंध में जिले के डीईओ को पत्र लिखना चाहिए। वैसे राशि इसलिए लिए जाती है, क्योंकि स्पोर्टस गतिविधियां संचालित करते हैं।
- एसआर कर्से, असिस्टेंट डायरेक्टर, डीपीआई
रिपोर्ट/फोटो : कृष्णा तिवारी
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