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डाउनलोड करेंयूटिलिटी डेस्क। किसी भी महिला के प्रेग्नेंट हो जाने के कुछ महीनों बाद यह चिंता रहती है कि गर्भ में पल रहा बच्चा फ्यूचर में हेल्दी रहेगा या नहीं। इस चिंता को दूर करने के लिए नॉन-इनवैसिव प्रीनैटल टेस्टिंग का सहारा लिया जा सकता है। इस टेस्टिंग के जरिए यह बता किया जा सकता है कि गर्भ में बच्चे को किसी तरह की बीमारी तो नहीं है या फ्यूचर में कोई बीमारी होगी या नहीं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिसर्च में यह साबित हुआ है कि नॉन-इनवैसिव प्रीनैटल टेस्टिंग के जरिए बच्चे के जन्म से काफी पहले डाउंस सिंड्रोम जैसी असामान्य क्रोमोसोम संबंधी गड़बड़ियों का पता लगाया जा सकता है। रिसर्च में इस तकनीक को काफी सटीक और सुरक्षित बताया गया है। इस टेस्ट को गर्भावस्था के 9वें सप्ताह में को भी गर्भवती महिला करवा सकती है। इस टेस्ट में मां की बांह से खून के सैम्पल लिए जाते हैं। इसके जरिए क्रोमोसोम संबंधी दिक्कतों की जांच की जाती है। रिसर्च का दावा है कि यह टेस्ट 99% तक बीमारी का सही तरीके से पता लगाने के लिए कारगर है।
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