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विकास के जिन पैमानों पर नीति आयोग ने जिलों को बताया पिछड़ा, उन्हीं पर कलेक्टर ले चुके हैं अवार्ड

3 वर्ष पहले
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भोपाल. नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के 8 जिले अभी भी बीमारू जिलों की श्रेणी में शामिल हैं। इसके बावजूद पिछले 10 साल में इन जिलों में तैनात आधा दर्जन कलेक्टरों ने न सिर्फ अपने काम के लिए शाबासी हासिल की, बल्कि जिलों के कलेक्टर्स ने जिन मामलों को लेकर अपनी ब्रांडिंग की, अवॉर्ड हासिल किए, उन्हीं मामलों में जिले पिछड़े हुए हैं।

-दरअसल, आयोग द्वारा चिन्हित किए गए पिछड़े जिलों के विकास कार्य की मॉनिटरिंग अब पीएमओ कर रहा है। . इसके लिए केंद्र सरकार ने हर जिले के लिए एक-एक नोडल ऑफिसर भी बना दिया है. इसके साथ ही राज्य सरकार के अधिकारियों को भी जिले का नोडल अधिकारी बनाया गया है। बताया गया है कि नीति आयोग ने प्रदेश के जिन जिलों को देश के पिछड़े जिलों में जगह दी है, उनमें से ज्यादातर जिले रसूखदार राजनेताओं के हैं। 

 

1-तेजस्वी एस. नायक- बड़वानी के कलेक्टर तेजस्वी एस नायक को स्वास्थ्य सेवाओं में नवाचार के लिए अवॉर्ड मिल चुका है. नीति आयोग ने स्वास्थ्य के मामले में बड़वानी को पिछड़े जिलों में भी 54वीं रैंक दी है. जिस पहाड़ी अंचल में टीके लगवाने के काम के लिए अवॉर्ड मिला, उसी पहाड़ी क्षेत्र के मरीजों को झोली में डालकर कंधे पर लादते हुए कई किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता है। 

2-श्रीनिवास शर्मा- दमोह कलेक्टर को मुख्यमंत्री ने युवा उद्यमियों के लिए अवॉर्ड दिया था. नीति आयोग ने जिले को शिक्षा में 40वीं, कृषि में 45वीं रैंक दी है. स्किल डेवलपमेंट में जिले को 11वीं रैंक दी है.

3-राजेश जैन- गुना कलेक्टर राजेश कुमार जैन को सरकारी अस्पतालों में बिना डॉक्टर के प्रसव कराने के लिए अवॉर्ड मिला है. नीति आयोग ने माना है कि जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत खराब है और उसे स्वास्थ्य के मामले में 47वीं और शिक्षा के लिए 88वीं रैंकिंग दी है।

4-एसबी सिंह- खंडवा के 2007 से 2010 तक यहां कलेक्टर रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एसबी सिंह को खंडवा में स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर काम के लिए अवॉर्ड मिला था। नीति आयोग ने जिले को स्वास्थ्य क्षेत्र में 91वीं रैंक दी है। जिले में ग्रामीण क्षेत्रों के लोग सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर और नर्सों के भरोसे हैं। 

-मामले पर बीजेपी का कहना है कि कामकाज के आधार पर कलेक्टर को सम्मानित किया गया है। विकास होने में समय लगता है। 12 साल में बहुत काम हुआ है। 

इन जिलों की हालत बीमारू 

- इसके अलावा बड़वानी, खंडवा, दमोह और गुना के साथ विदिशा, राजगढ़, छतरपुर, सिंगरौली भी बीमारू जिले के पैमाने पर हैं। विदिशा को 42वीं रैंक, राजगढ़ को 15वीं रैंक, छतरपुर को 26 वीं रैंक, सिंगरौली 99 वीं रैंक मिली है। ये रैंक स्वास्थ्य, वित्तीय, स्किल डेवलपमेंट, शिक्षा, कृषि और आधार ढांचे को लेकर मिली है। बता दें कि नीति आयोग ने 101 जिलों में जिस जिलो जितनी रैंकिंग दी है, वे उतने ही पिछड़े माने जाएंगे।

-वहीं, इस मामले पर कांग्रेस का कहना है कि बीमारू जिलों को लेकर सरकार को सोचने की जरूरत है। सीएम शिवराज सिंह चौहान एक तरफ विकास की बात कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ आठ जिलों की हालत ऐसी है। 

PMO करेगा मॉनिटर
-नीति आयोग द्वारा चिन्हित किए गए पिछड़े जिलों के विकास कार्य की मॉनिटरिंग अब सीधे पीएमओ से होगी। इसके लिए केंद्र सरकार ने हर जिले के लिए एक-एक नोडल ऑफिसर भी बना दिया है। इसके साथ ही राज्य सरकार के अधिकारियों को भी जिले का नोडल अधिकारी बनाया गया है। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 अप्रैल को मंडला में खुद इन आठ जिलों के कलेक्टर्स के साथ जिलों के विकास के रोडमैप पर बातचीत कर सकते हैं। 

ये पिछड़े जिले रसूखदार नेताओं के 
-नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के जिन जिलों को देश के पिछड़े जिलों में जगह दी है, उनमें से ज्यादातर जिले रसूखदार राजनेताओं के हैं। इससे प्रदेश के विकास का अंदाजा लगाया जा सकता है।

किस जिले को कौन-सी रैंक
विदिशा : 42वीं रैंक। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का संसदीय क्षेत्र। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पिछले 9 सालों से सांसद। 12 साल से मुख्यमंत्री पद पर बैठे शिवराज सिंह चौहान 5 बार यहां से सांसद रहे और इसे उनका दूसरा गृह जिला माना जाता है।
गुना : 47वीं रैंक। गुना हमेशा से ग्वालियर के सिंधिया राजघराने का गढ़ रहा। पहले माधवराव सिंधिया और अब उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से सांसद हैं।
राजगढ़ : 15वीं रैंक। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का गृह जिला। दिग्विजय सिंह दस साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
खंडवा : 41वीं रैंक। कांग्रेस सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय सुभाष यादव और भाजपा के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का गृह जिला।

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