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डाउनलोड करेंहारुन रशीद
बीबीसी उर्दू के पाकिस्तान संपादक
नवाज़ शरीफ़ के लिए कई चुनौतियां तैयार खड़ी हैं.
चुनाव के नतीजों के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि पाकिस्तान में अगले प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ बनेगें. लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में, जहां 66 सालों के लगभग आधे वक्त में फौजी तानाशाह सत्ता में बने रहे, नवाज़ शरीफ़ के लिए सत्ता की राह इतनी आसान न होगी.
कई बुनियादी सवाल हैं जो मुंह बाए उनकी ओर देख रहे हैं और उन्हें इसका जवाब जल्द खोजना होगा.
कौन-कौन देगा उनका साथ?हालांकि पीएमएल (एन) को संसद में उम्मीद से ज़्यादा सीटें हासिल हुई हैं और पंजाब के लोगों ने भी उनके साथ जाने की मुहर लगाई है.लेकिन लगता नहीं है कि पार्टी को केंद्र में अपने बलबूते बहुमत हासिल होगा.
तो वो कौन सी राजनीतिक पार्टियां होंगी जो मौक़ा आने पर उनके गठबंधन में शामिल होकर नवाज़ शरीफ को सरकार बनाने में मदद कर सकती हैं?
सिंध के कराची में मज़बूत राजनीतिक दल मुत्ताहिदा क़ौमी मुवमेंट के प्रमुख अलताफ़ हुसैन ने नवाज़ शरीफ़ को जीत पर मुबारक दी है.
हालांकि दोनों दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान एक दूसरे के ख़िलाफ़ कड़े शब्दों के प्रयोग किए थे.
लेकिन चुनाव प्रचार और सरकार बनाना दोनों अलग-अलग बात है.
इमरान ख़ान ने नवाज़ शरीफ़ को कड़ी चुनौती दी जो शायद आगे भी जारी रहे.
उसी तरह जमीयत उलमाए इस्लाम (फ़ज़लुर्रहमान) के बारे में तो कहा जाता है कि वो किसी के साथ भी जा सकते हैं.
लग रहा है कि स्वतंत्र उम्मीदवारों को भी ख़ासी सीटे हासिल होंगी. तकरीबन 40 से 50 के बीच.
चुनाव आयोग ने उनसे कहा है कि वो तीन-चार दिनों में ये तय कर लें कि वो किसी दल के साथ जाना चाहते हैं या अलग-अलग.
लेकिन अक्सर स्वतंत्र रूप से जीते हुए सांसद उस दल के साथ जाना चाहते हैं जो सरकार बनाने की स्थिति में होता है या सरकार बना रहा होता है.
क्या उम्मीदें हैं जनता की?पंजाब के प्रांतीय और नेशनल असेंबली के लिए नवाज़ शरीफ़ को जो इतने वोट मिले हैं उसकी वजह बिजली की भारी क़िल्लत रही है.
लोगों की अपेक्षा है कि वो इसे जल्द से जल्द हल कर सकेंगे.
लेकिन ये उतना आसान न होगा क्योंकि बिजली उत्पादन को जल्द बढ़ाना मुश्किल होगा.
चरमपंथ का बहुत बड़ा चैलेंज अभी भी उनके सामने खड़ा है. चरमपंथ से उन हालात में निपटना जबकि फौज का नवाज़ शरीफ़ को शायद बहुत बड़ा समर्थन न हासिल हो उनके लिए चुनौती होगाय
उन्होंने अमरीका की चरमपंथ के ख़िलाफ़ जारी लड़ाई से भी अलग होने की बात कही है.
फौज के साथ रिश्ते और इसका अमरीका के साथ संबंधो पर असर?फ़ौज के साथ नवाज़ शरीफ़ के पेचीदे रिश्ते ने लोगों को चिंता में डाल रखा है.
नवाज़ शरीफ़ ने सेना प्रमुख जहांगीर करामत के साथ मतभेदों के बाद उन्हें हटाकर परवेज़ मुशर्रफ़ को सेना प्रमुख नियुक्त किया था.
उन्होंने परवेज़ मुशर्रफ़ को दो वरिष्ठ अफसरों लेफ्टीनेंट जनरल अली क़ूली ख़ान और ख़ालिद नवाज़ पर तरजीह दी थी.
लेकिन बाद में परवेज़ मुशर्रफ़ ने उनका तख़्ता पलट डाला.
वो दूसरे मुल्क के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के इस्तेमाल को ख़त्म करने की बात कह रहे हैं.
ये वो बात है जिसपर सेना से मतभेद बढ़ सकते हैं क्योंकि अमरीका का चरमपंथ विरोधी अभियान परवेज़ मुशर्रफ़ के समय शुरू हुआ था और ज़ाहिर है इसमें सेना की पूरी हामी थी.
मुशर्रफ़ के जाने के बाद भी ये जंग जारी रही थी और ड्रोन के लिए पाकिस्तानी वायु क्षेत्र का इस्तेमाल होता रहा है.
अमरीका से रिश्ते?अमरीका अगले साल यानी 2014 में अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जा रहा है लेकिन वो इस क्षेत्र में उपस्थिति समाप्त करना चाहेगा या नहीं ये भी एक सवाल है.
अमरीका के प्रमुख अख़बार \'न्यूयार्क टाइम्स\' के संवाददाता डेक्लिन वाल्श ने लिखा है कि नवाज़ शरीफ़ ने वादा किया है कि वो पाकिस्तान में अमरीका के प्रभाव को कम करेंगे.
उनका कहना है कि इससे अमरीका के पाकिस्तान के साथ पहले से ही तनावपूर्ण हो गए रिश्तों पर और सवालिया निशान खड़ा हो जाएगा.
डेक्लिन वाल्श को पाकिस्तान ने \'नापसंदीदा कारगुज़ारियों\' के चलते मुल्क से बाहर जाने का हुक्म दिया था.
नवाज शरीफ़ ने परवेज़ मुशर्रफ़ को कई जनरलों पर तरजीह देकर सेनाध्यक्ष बनाया था.
लेकिन ब्रितानी \'टेलिग्राफ़\' समाचारपत्र के मुताबिक़ नवाज़ शरीफ़ ने पश्चिमी मुल्कों को यक़ीन दिलाने की कोशिश की है कि वो अल-क़ायदा और तालिबान के ख़िलाफ़ जंग से पीछे नहीं हटेंगे.
समाचारपत्र के मुताबिक़ उन्होंने संडे टेलीग्राफ़ से बात करते हुए कहा, \"मुझे अमरीका के साथ काम करने का तजुर्बा है और मुझे उनके साथ आगे काम करने में भी खुशी होगी.\"
पड़ोसी मुल्क भारत से तालुक्क़ात?भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में शांतिवार्ता के शुरू होने में नवाज़ शरीफ़ का रोल सबसे अहम था.लेकिन कारगिल युद्ध भी उन्हीं के दौर में हुआ.
हालांकि उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें इस मामले में सेना प्रमुख, परवेज़ मुशर्रफ़ ने अंधेरे में रखा था.
लेकिन नवाज़ शरीफ़ को बीच-बचाव के लिए अमरीका की दौड़ लगानी पड़ी थी.
साथ ही अगर नवाज़ शरीफ़ तालिबान के प्रति नर्म रूख अख़्तियार करते हैं, तो चरमपंथी भारत के साथ बेहतर संबंधों को शायद न पसंद करें.
पाकिस्तान ने साल 1988 का अपना परमाणु परीक्षण भी किया था. ये भारत में हुए परीक्षण के दो हफ्तों बाद ही किया गया.
कैसे करेंगे प्रांतीय हुकुमतों के साथ तालमेल?जहां पंजाब में नवाज़ शरीफ़ को बड़ा बहुमत मिला है वहीं सिंध पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और ख़ैबर पख़्तूनख्वाह पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ के पक्ष में गया है.
एक जगह पिछड़ेपन की विकराल समस्या है तो उत्तर पश्चिमी प्रांत चरमपंथ से जूझ रहा है.
(बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली की बीबीसी उर्दू के पाकिस्तान संपादक हारून रशीद से बातचीत पर आधारित)
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