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डाउनलोड करेंपाकिस्तान में पीएमएल (एन) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में ऊभर रही है
अंग्रेज़ी में एक कहावत है, 'थर्ड टाइम लकी', यह कहावत पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) के नेता नवाज़ शरीफ़ पर सही बैठती हैं.
वो दो बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. दोनों ही बार उन्होंने कहा था कि वे भारत के साथ रिश्तों को और बेहतर बनाएंगे. लेकिन दोनों ही बार उन्हें इसमें कामयाबी नहीं मिली. मैं ऐसा तो नहीं कहूंगा कि उनकी वजह से ही ऐसा हुआ. लेकिन कोई वजह जरूर रही होगी.
अब यह तय है कि नवाज़ शरीफ़ तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनेंगे. ऐसे में दोनों देशों के लिए मेरी दुआ है कि तीसरी बार वे लकी साबित हों.
वैसे अगर इमरान ख़ान प्रधानंत्री बनते तो वे भारत के साथ संबंधों को तवज्जो तो जरूर देते. लेकिन इमरान ख़ान अभी इंपल्सिव हैं. एक राजनेता के रूप में उनकी परीक्षा अभी नहीं हुई है.
वहीं नवाज़ शरीफ़ एक मंझे-मंझाए राजनेता है. वे जेल भी जा चुके हैं और सैन्य शासन के साथ टकरा चुके हैं. अगर नवाज़ शरीफ़ बदलें न तो वे इमरान ख़ान से बहुत अलग और बेहतर साबित होंगे.
नवाज़ शरीफ़ का सेना से हर बार कुछ न कुछ मनमुटाव हुआ है. उन्होंने पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) की सरकार को पांच साल तक चलने दिया है, हालांकि वे चाहते तो सरकार गिरा भी सकते थे.
पीपीपी के पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया और ज़रदारी सरकार को कभी भी गिराने की कोशिश नहीं की. उन्हें लगा कि अगर देश में लोकतंत्र को मजबूत करना है तो उन्हें इस तरह से सहयोग देना होगा.
सेना के साथ उनका हमेशा से मनमुटाव रहा है. यह उनकी राजनीति का एक पक्ष है. मुमकिन है कि वैसा एक बार फिर हो जाए. लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अगला सेना प्रमुख कौन होता है. हमें देखना होगा कि आगे क्या होता है.
मैं एक ख़ास चीज को ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा कि तहरीके़ तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने शुरू में ही कहा था कि उसका लोकतंत्र में भरोसा नहीं है. वह चुनाव नहीं होने देगी. उन्होंने अंत तक बम बरसाए और तीन पार्टियों को निशाने पर भी रखा.
यह चुनाव वहाँ एक तरह से लोकतंत्र का इम्तिहान था. इसमें वे खरे उतरे हैं. इस माहौल में भी वहाँ 50 फ़ीसदी से अधिक मतदान हुआ. इसके लिए मैं पाकिस्तान की जनता को बधाई देना चाहूंगा.
(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़जल के साथ हुई बातचीत पर आधारित)
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