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पाकिस्तानः आखिर इमरान खान चाहते क्या हैं

7 वर्ष पहले
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सबा एतज़ाज़

बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान ने फैसलाबाद के लोगों को ये दावत दी थी कि वे आएं और हुकूमत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करें.

लेकिन जितने लोगों के आने की उम्मीद की गई थी, उतने लोग नहीं आए और इसकी बड़ी वजह ये है कि फैसलाबाद वज़ीर-ए-आज़म नवाज़ शरीफ का गढ़ माना जाता है.

और जैसा कि इमरान खान ने दावा किया था कि वे शहर को पूरी तरह से बंद कर देंगे, वो भी देखने को नहीं मिला.

लोगों ने दफ्तर, स्कूल, कॉलेज और कारोबार खुले रखे और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पहले की तरह बरकरार रही.

पढ़ें विस्तार से

इमरान खान काफी समय से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार ने उनकी मांगों को लेकर एक आयोग भी बना दिया है.

लेकिन कई लोगों के मन में ये भी धारणा बन रही है कि इमरान खान किसी भी मुद्दे पर तैयार नहीं हो रहे हैं. किसी की सुन नहीं रहे हैं.

तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के अपने रवैए में भी कई यू-टर्न्स दिखाई देते हैं.

पहले उन्होंने चुनावों में हेराफेरी का मुद्दा उठाया, उसके बाद उन्होंने नवाज़ शरीफ के इस्तीफे की बात कही. उसके बाद चुनावों में धांधली की बात दोबारा से की गई.

राजनीतिक विरोध

फिर उन्होंने कहा कि हम धरना देंगे लेकिन वो भी आखिरकार खत्म हो गया. ये उनका प्लान ए था.

उसके बाद इमरान खान ने प्लान बी के तहत रैलियां निकालीं और प्लान सी के तहत उन्होंने घोषणा कि वे देश में सिलसिलेबार तरीके से हड़ताल और तालाबंदी करेंगे.

सियासी जानकारों का कहना है कि इमरान खान ने धरने और राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों का एक बेहद जटिल घालमेल बना दिया है और लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर इमरान चाहते क्या हैं.

और क्या वह पूरा हो भी रहा है कि नहीं या सिर्फ देश में अफरातफरी फैलाना का माहौल बनता जा रहा है.

धांधली के आरोप

यहां यह भी एक बड़ा सवाल है कि जिन चुनावों में इमरान खान धांधली की बात कर रहे हैं, उससे संबंधित केवल चार सीटें हैं, जिनको लेकर ये आरोप लगाए गए हैं.

अगर सरकार इन सीटों पर चुनाव के लिए तैयार हो जाती है और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी इन पर चुनाव जीत भी जाती है तो सरकार की सेहत पर इसका कोई असर पड़ने वाला नहीं है.

चुनावों में धांधली के आरोप को किनारे रखकर इमरान खान कह रहे हैं कि ये सिस्टम ही पूरा करप्ट है और हम इसमें तब्दीली लाएंगे और इसके लिए मौजूदा हुकूमत को सत्ता छोड़नी होगी.

कदम दर कदम इमरान खान के स्टैंड में बदलाव देखने को मिल रहा है.

बॉडी लैंग्वेज

राजनीतिक प्रेक्षकों इन परिस्थितियों पर नवाज़ शरीफ पर पड़े रहे सियासी दबाव का आकलन भी कर रहे हैं.

सार्क सम्मेलन या अन्य सार्वजनिक मौकों पर नवाज़ शरीफ के बॉडी लैंग्वेज़ में दबाव देखा भी जा रहा है.

इमरान खान का मुख्य राजनीतिक जनाधार देश के युवाओं के बीच है. युवाओं का कहना भी है कि उन्हें बदलाव चाहिए, वे पुराने निज़ाम से मायूस भी हैं.

इमरान के समर्थकों की तादाद बढ़ी है. लोगों को इकट्ठा करने के इमरान के तौर तरीके कारगर रहे हैं. इससे अच्छी तादाद में लोग इकट्ठे होते हैं.

कानून व्यवस्था

जिन जिन शहरों में वे जाते हैं, वहां उनकी ताकत बढ़ती है और वहां की कानून व्यवस्था पर भी इसका दबाव पड़ता है.

पंजाब सूबे में उनका ये पहला बंद था, हिंसा कुछ छिट पुट घटनाएं हुईं और कहा ये भी जा रहा है कि इन झड़पों की वजह से इमरान खान को एक नई ऊर्जा मिल गई है.

इमरान के प्लान सी के तहत पंजाब के चयन के भी अपने सियासी मतलब हैं, फैसलाबाद के बाद उनका अगला ठिकाना लाहौर होगा.

(बीबीसी हिंदी के सहयोगी निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित)

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