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डाउनलोड करेंहानिया अली
बीबीसी संवाददाता
आप को सुनकर हैरत हो सकती है कि पाकिस्तान में एक ऐसा रेस्तरां भी मौजूद है जहां पाकिस्तानियों का ही स्वागत नहीं है.
इस्लामाबाद में मौजूद \'ल मेसॉस\' रेस्तरां के शेफ़ कहते हैं कि उनका ये फ़ैसला मुसलमानों की धार्मिक आस्थाओं को ध्यान में रखकर लिया गया है क्योंकि रेस्तरां में ग़ैर हलाल भोजन और शराब परोसा जाता है. लेकिन पाकिस्तान के कुछ लोगों में इस बात को लेकर नाराज़गी है और ये मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहा.
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इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब इस्लामाबाद में मौजूद एक पत्रकार को एक फ्रांसीसी रेस्तरां के विवादास्पद नियम का पता चला. सेरल अलमीदा कहते हैं, \"मैंने इसके बारे में कुछ ही दिनों पहले सुना था. मुझे तो यक़ीन ही नहीं हुआ. यह रेस्तरां के खुलने के कुछ ही दिनों के बाद की बात है.\"
सेरल अलमीदा ने फ़ैसला किया कि वो अपनी शख्सियत को छुपा कर वहां जाएंगे और उस जगह के बारे में मालूम करने की कोशिश करेंगे जो पाकिस्तानियों को अपने यहां भोजन परोसने से मना कर रहा है. उन्होंने रेस्तरां में एक फर्जी नाम से रिजर्वेशन करवाने की कोशिश की. जब रेस्तरां ने इसके लिए मना कर दिया तो उन्होंने इसके खिलाफ़ ट्वीटर पर \'रंगभेद नहीं चलेगा\' के नाम से एक मुहिम शुरू कर दी.
अल्पसंख्यकों को इजाजतबीबीसी एशियन नेटवर्क से बात करते हुए उन्होंने कहा, \"रेस्तरां की पॉलिसी बेतुकी है. एक आम शहरी को लगा कि अगर वो पाकिस्तानियों के अपने यहां आने पर रोक लगा देगा तो उसके व्यवसाय में फ़ायदा होगा. इसका कोई कानूनी आधार नहीं है और ये गलत भी है.\"
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लेकिन \'ल मेसॉंस\' के मालिक फ़िलिप लफ़ॉं की राय इस मामले पर बिल्कुल अलग है. उनका कहना था कि उन्होंने मुस्लिम ग्राहकों को अपने यहां आने से इसलिए मना किया क्योंकि उनके रेस्तरां में परोसा जाने वाला भोजन उनके आहार संबंधी मान्यताओं से मेल नहीं खाता है और साथ ये भी कि कई लोग मदिरा परोसे जाने का भी विरोध करते हैं.
फ़िलिप कहते हैं, \"हमें मुस्लिमों के लिए इस तरह की जगह खोलने की इजाजत नहीं है. पाकिस्तान के जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं उनका स्वागत है, उन्हें नहीं रोका गया. उनके मामले पर हमें कोई दिक्कत नहीं थी. यही सच है.\"
नूवीन खुद अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय से तालुक्क रखती हैं. लेकिन उनका मानना है कि समाज के एक तबके पर उनकी धार्मिक आस्था के आधार पर रोक लगाना उनके मूलभूत अधिकारों पर चोट है.
वो कहती हैं, \"मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को जिस चीज़ का इस्तेमाल करना है उसे चुनने का अधिकार दिया जाना चाहिए. वो ये कर सकते थे कि वो ग्राहकों को बता सकते थे कि मेनू में ये सब मौजूद है, अगर आपको इनके इस्तेमाल में कोई दिक्कत नहीं है तो ठीक है. नहीं मुझे नहीं लगता कि उन्हें ये अधिकार था कि वो दूसरे के चुनने के अधिकार पर रोक लगा दें, वो उन्हें आने देते.\"
शराब और सूअरसारा एक ब्रितानी नागिरक हैं, हालांकि ये उनका असली नाम नहीं है. लेकिन उन्हें इस रेस्तरां में खाना खाने दिया गया लेकिन इसलिए कि वो ब्रितानी हैं लेकिन पहले उनसे उनकी पहचान मांगी गई. सारा का मानना है कि रेस्तरां पूरे मामले को किसी दूसरे तरीके से कर सकता था.
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उन्होंने बताया, \"यही काफ़ी होता कि वो ग्राहकों को कह देते कि यहां गैर हलाल भोजन और शराब परोसा जा रहा है. इसके बाद ये ग्राहकों पर निर्भर करता कि वो यहां खाना खाना चाहते थे या नहीं.
लेकिन सहाबत ज़करिया इससे इत्तेफ़ाक नहीं रखतीं. उनका कहना है कि पाकिस्तान में मजहब बहुत ही संवेदनशील मामला है. उनका कहना है कि रेस्तरां दो हिस्से तैयार कर सकता था. वह कहती हैं, \"ये कानून है कि वो पाकिस्तानी मुसलमानों को शराब और सूअर का गोश्त परोस नहीं सकते. इसलिए जिन पाकिस्तानियों को वो अपने यहां आने दे सकते हैं वो सिर्फ अल्पसंख्यक पाकिस्तानी ही हो सकते हैं.\"
चेफ फ़िलिप का कहना है कि वो रेस्तरां को एक प्राईवेट क्लब में तबदील कर देंगे और यहां आने को क्लब की मेम्बरशिप लेनी होगी. लेकिन वो इस बात पर अड़े हैं कि यहां की मेम्बरशिप किन लोगों को हासिल हो सकेगी.
उन्होंने कहा, \"मैं इसे दोबारा खोलूंगा. इसकी मेम्बरशिप होगी. लोग फ्रांसीसी भोजन का मज़ा ले सकते हैं. सदस्यता उन्हें दी जाएगी जिनके पास विदेशी पासपोर्ट होगा. पाकिस्तानी अल्पसंख्यक भी इसके सदस्य बन सकेंगे.\"
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