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Success story : एक सीन के लिए 3-4 टेक लेने पर जिसने दी थी गालियां, 8 साल बाद उसी ने आकर पंकज त्रिपाठी से कहा- सर आपने गजब का काम किया है

वासेपुर के 'सुल्तान' से भी आगे निकल गया मिर्जापुर का 'कालीन भइया'

Dainik Bhaskar

Dec 01, 2018, 03:18 PM IST
Pankaj Tripathi success story life and struggle

एंटरटेनमेंट डेस्क. अमेजन प्राइम की वेब सीरीज 'मिर्जापुर' की सोशल मीडिया पर खूब तारीफ हो रही है। खासकर इसमें बाहुबली अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ कालीन भइया का किरदार निभाने वाले पंकज त्रिपाठी के काम की खूब सराहना हो रही है। गैंग्स ऑफ वसेपुर का सुल्तान ने कालीन भइया तक पहुंचने में काफी संघर्ष किया है। हाल ही में उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि कैसे बिहार के एक छोटे से गांव में रहते थे और कैसे मुंबई में उन्हें स्टूडियो का दरबान ही बाहर कर देता था। एक किस्सा याद करते हुए पंकज ने बताया कि किस तरह एक एक्शन डायरेक्टर ने तीन-चार टेक लेने के बाद उन्हें गालियां दी थीं। पंकज का बचपन भी काफी अभावों में गुजरा. गोपालगंज (बिहार) के जिस गांव में वे रहते थे, वहां लाइट नहीं थी. 10वीं तक उन्होंने सिनेमा हॉल और ट्रेन का स्लीपर कोच तक नहीं देखा था। हालांकि समय बदला और अपनी मेहनत से पंकज आज किसी पहचान के मोहताज नहीं।

गैंग्स ऑफ वसेपुर, फुकरे और अनगिनत फिल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखा चुके पंकज की सक्सेस स्टोरी, जैसा उन्होंने इंटरव्यू में बताया...

गाली मिली, तो सोच लिया था- सिर फोड़कर गांव चले जाएंगे

मैं गांव से आया था, मुझे नहीं पता था कि एक्शन सीन कैसे शूट होते हैं। जब 3-4 टेक हो गए तो एक्शन डायरेक्टर ने अपने असिस्टेंट से कहा- किसे (गाली देते हुए) पकड़ लाए हो। गाली सुनकर मेरा मूड खराब हो गया। गुस्सा बहुत आया। तभी एक सीनियर एक्टर मिले, बोले क्या हुआ। मैंने बताया कि मुझे गाली दी मैं इसका सिर फोड़कर गांव चला जाऊंगा। नहीं करनी एक्टिंग। फिर उन्होंने समझाया-इन गालियों को इकट्ठा करो और अपने काम पर फोकस करो, एक दिन यही आएंगे और सर बोलेंगे। वही हुआ। 8 साल बाद एक फिल्म की स्क्रीनिंग में वही व्यक्ति आया और बोला- वाह सर, क्या काम किया है।

भाभी पहले ही समझ गई थीं- मुझमें कुछ है!
मेरी भाभी (रीता तिवारी) कहती हैं, हम तुम्हें 9वीं क्लास में ही पहचान गए थे कि तुममे कुछ है। उसी दिन लग गया था कि तुम कुछ बड़ा करोगे और नाम कमाओगे।

किसी दिन बीवी न कह दे- नॉट फिट
शुरुआती दिनों में ज्यादातर ऑडिशन के बाद मुझे एक ही जवाब मिलता था-नॉट फिट। इसकी इतनी आदत हो गई थी कि लगता था किसी दिन बीवी दरवाज़ा खोले और न कह दे- नॉट फिट।

डॉक्टर पहचान गया और पैसे भी वापस कर दिए!
एक बार का किस्सा है। गैंग्स ऑफ वसेपुर रिलीज हो चुकी थी। उसी बीच मेरी मां बीमार थी और मैं मुंबई में था। रात को 1 बजे फोन कर रहा था कहां इलाज हो रहा है। पता चला थायराइड की प्रॉब्लम है और पटना आ गई थी। मैं सुबह की फ्लाइट से पटना पहुंच गया। डॉक्टर के पास पहुंचा। उसने मेरी मां को देखा, फिर मुझे। फिर रुक से गए। बोले- सुल्तान? मैंने कहा- हां सर। बोले-आप आए हैं? बताए क्यों नहीं ये आपकी मां हैं। फिर इलाज किया और उसके बाद बाहर तक छोड़ने आए, फिर एकदम से उनका असिस्टेंट आया और उसने इलाज के लिए जमा कराए पैसे वापस दिए। ये जब मेरे बाबूजी को पता चला तो उन्होंने गांव में सबको बताया-,'' मेरे लड़के को देखकर डॉक्टर ने इलाज का पैसा लौटा दिया। उसके बाद फोन करता था, तो वो डॉक्टर कहते थे-मां की सेहत की चिंता आप न कीजिए, सिर्फ शूटिंग कीजिए, उनको मैं देख लूंगा।

अगला काम मिलेगा या नहीं, पता नहीं रहता था
एक वक्त मुझे लगता था कि मुझे अगला काम नहीं मिलेगा। हमेशा सोचता रहता कि ये शूटिंग खत्म होने के बाद अगली बार कैमरा कब देखूंगा। जबकि मैं सबकुछ कर सकता था। गुंडा बनकर आपको डरा भी सकता हूं और मिठाई वाला बनकर हंसा भी सकता हूं।

कभी अफसोस नहीं किया, अभावों में भी खुश रहे
मेरा बचपन थोड़ा कठिन था। गांव में रहते थे, वहां लाइट नहीं थी। टीवी, रेडियो तो दूर की बात. 10वीं तक मैंने सिनेमा हॉल या ट्रेन का स्लीपर कोच तक नहीं देखा था। लेकिन मैं खुश था. कभी शिकायत नहीं की। प्रकृति के नज़दीक ज्यादा रहे, घर के पीछे नदी थी, वहीं दोस्तों के साथ खेलते थे। नदी में तैरने जाते थे तो बड़े लोग मज़ाक करते थे कि पनडुब्बी (एक तरह का कीड़ा, जो पानी की सतह पर तेजी से चलता था) पीकर ही तैरना सीखोगे, तो हम भी एक-दो बार कीड़ा पी गए. लेकिन कहां पता था कि तैरना सीख जाएंगे तो नदी से ही दूर हो जाएंगे।

पिताजी डॉक्टर बनाना चाहते थे
पिताजी का सपना था मैं डॉक्टर बनूं. दो बार एक्जाम भी दिया मैंने लेकिन हुआ नहीं। 35-40 नंबर में ही मैं खप जाता था. लेकिन अच्छा हुआ जो नहीं हुआ। बस डॉक्टर का 'टर' नहीं लेकिन एक्टर का 'टर' रह गया।

मनोज वाजपेई बेतिया से नहीं आते, तो मैं भी नहीं बनता एक्टर
मनोज वाजपेई बेतिया से आए, कॉन्वेंट में पढ़े लिखे। मैं तो गांव में रहता था। उन्होंने हम जैसों के लिए नया रास्ता खोला. मैं सोचता था कि मनोज अगर वहां से आकर स्टार बन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. एक नया रास्ता खोला था उन्होंने, जो मेरे और मेरे जैसों अनगिनत के लिए नई दुनिया थी।

10 साल से ज्यादा भटका हूं, धक्के खाए
जब पहली बार मुंबई आया, तो संघर्ष शुरू किया। शुरुआत में तो किसी स्टूडियो जाते तो दरबान ही भगा देता था। कहता था-फोटो दे जाओ, तब कास्टिंग डायरेक्टर जैसा कुछ नहीं होता था। उस वक्त रामोजी का टाइम चल रहा था, नए लोगों को खूब मौके देते थे। उनके दफ्तर के बाहर 250 लोग लाइन लगाकर खड़े रहते थे, मैं भी उनमें से एक था।

लवस्टोरीः 10वीं में तय कर लिया था इसी से शादी करेंगे!
मैंने 10वीं तय कर लिया था कि दहेज नहीं लेना था। बहन का तिलक लेकर गए थे, वहीं पत्नी मृदुला मिल गई। अचानक सीढ़ियों से नीचे उतरी और पलट कर देखी तभी लग गया यही है। 1993 का शुक्रवार था, (तारीख याद नहीं) रात के साढ़े आठ बजे थे उसी वक्त तय कर लिया कि इसी के साथ बाकी जीवन बीतेगा। नहीं सोचा, कौन है, भाव देगी या नहीं, हां करेगी या नहीं। 2004 में उसी से शादी कर ली। वो कलकत्ता रहती थीं और मैं गांव में रहता था। फिर पढ़ने दिल्ली चला गया। मोबाइल भी नहीं था। डेढ़ साल में एक बार मिलने कलकत्ता जाते थे। डेट क्या होती है, ये तो पता ही नहीं था। NSD में रात 8 बजे फोन आना तय था।

आप गोबर उठाने में भी आर्ट क्रिएट कर सकते हैं
जिस देश में रेलवे का कन्फर्म टिकट लेना मुश्किल है वहां अभिनेता बनना भी उतना ही मुश्किल है। लाखों लोग हैं, उनके सपने हैं, उनकी मेहनत है। मौका मिलने की बात है। वेकैंसी निकलती है तो 1000 पोस्ट के लिए 10 लाख फॉर्म आते हैं। लेकिन पहले असेसमेंट कर लो क्या बनना चाहते हो। जरूरी नहीं कि आप सिनेमा के ही अभिनेता बनो, आप गोबर उठाने में भी आर्ट क्रिएट कर सकते हो, और उसे कैनवास पर भी डाल सकते हो। जिंदगी के हर हिस्से में अपनी आर्टिस्टिक अप्रोच रख सकते हैं, वो जानना जरूरी है। संतुष्टि बहुत जरूरी है।

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